राकेश कुमार धुरिया
बताया जाता है कि बाबा बीरभान और चन्द्रभान दो भाई थे। बीरभान खरगीपुर में रहते थे और चन्द्रभान बुकनापुर में रहते थे। बताया जाता है कि बीरभान बाबा जमींदार थे और आस पास के गाँव से कर वसूलते थे। जिसे लेकर एक विशेष जाति समुदाय को बुरा लगता था। ऐसे लोग बाबा बीरभान को आपने रास्ते से हटाना चाहते थे। इसी बात को लेकर बाबा बीरभान की हत्या की साजिश रची गई। बताया जाता है कि पड़ोस के गाँव के कुछ व्यक्ति विशेष घात लगा कर बाबा बीरभान का सर धड़ से अलग कर दिया। घोड़े पर सवार बाबा बीरभान कुछ देर तक तो अकेले लड़े लेकिन साजिश कर्ता संख्या में ज्यादा होने की वजह से उनका सर कलम करके मौत के घाट उतार दिया। किवदंति है, कि बाबा बीरभान का कटा हुआ सर पड़ोस के ही किसी हरिजन के द्वार पर पहुंच कर पानी माँगा। कटा हुआ सर देखकर उक्त हरिजन महिला डर गई। किन्तु बाबा ने उन्हें संतावना दिया और पानी पीकर वहाँ से आगे चले। बाबा का कटा हुआ सर लुढ़कते हुए खरगीपुर की बाग में आकर रुक गया। वही पर बकरी चरा रहे किसी से आम और नीम की टहनीयों को लेकर बाबा ने अपने मुँह में रख लिया। बताया जाता है कि वही टहनियां आगे चल कर एक विशाल पेड़ का रूप ले लिया। और तभी से बाबा पूज्यनीय हो गये। बताया जाता है की बाबा की हत्या करने वाले पूरे परिवार पर ब्रम्ह हत्या का पाप लगा और उनके घरों पर बेमौसम पत्थर गिरना, आग लगना आदि आदि शुरू हो गया। और भट्ट परिवार बाबा बीरभान की सेवा करने में जुट गया। और इसी का परिणाम आज विशाल भड़ारे के रूप में देखा जा रहा है।
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मान्धाता नगर पंचायत के खरगीपुर की बाग में होने वाला बीरभान बाबा का विशाल भंडारा कल होगा
