“रोटी छिनी तो सड़कों पर उतरेंगे” — प्रशासन की सख्ती से लाखों मजदूरों पर टूटा रोज़गार का पहाड़
प्रयागराज। यमुनापार/करछना/लालापुर/घूरपुर/बारा/नैनी: यमुना किनारे अवैध खनन के खिलाफ प्रशासन ने ऐसा सख्त अभियान चलाया है कि पूरे इलाके की तस्वीर ही बदल गई है। जहां पहले दिन-रात बालू ढुलाई होती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। घाटों को जेसीबी से खोदकर पूरी तरह खत्म कर दिया गया है, रास्तों को काट दिया गया है और दर्जनों वाहन सीज कर दिए गए हैं। लेकिन इस कार्रवाई का सबसे बड़ा असर उन गरीब मजदूरों पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी सीधे यमुना की बालू पर टिकी थी।
करछना में छापा—बालू फिंकवाई, रास्ते बंद
करछना के कबरा घाट पर खनन विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए अवैध बालू को मौके पर ही फिंकवा दिया।घाट तक जाने वाले रास्तों को जेसीबी से खुदवाकर बंद कर दिया गया। मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई तेज कर दी गई है।
लालापुर बना कार्रवाई का केंद्र—पंन्द्रह दिन में बड़ा प्रहार
लालापुर में बीते पंन्द्रह दिनों में प्रशासन ने सबसे बड़ा अभियान चलाया। यमुना किनारे के लगभग सभी अवैध घाटों को जमींदोज कर दिया गया।
दर्जनों ट्रैक्टर, जेसीबी और गाड़ियां सीज
खनन अधिनियम और बीएनएस के तहत मुकदमे दो करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना रात में दोगुनी पुलिस गश्त थाना प्रभारी का बयान साफ—”अब एक भी अवैध खनन बर्दाश्त नहीं होगा, हर हाल में कार्रवाई जारी रहेगी।” नैनी और घूरपुर में ‘स्पेशल टास्क’ का कहर नैनी और घूरपुर में एडीएम प्रशासन, राजस्व और खनन विभाग की स्पेशल टीम ने मिलकर कई वाहनों को सीज किया। रास्तों को काट दिया गया ताकि दोबारा खनन न हो सके। मुकदमे दर्ज कर सख्त संदेश दिया गया।
बारा में भी कार्रवाई—हर तरफ शिकंजा
बारा क्षेत्र में भी अवैध खनन से जुड़े वाहनों को सीज कर दिया गया है। पूरे यमुनापार में प्रशासनिक सख्ती का असर साफ दिख रहा है। लेकिन…सबसे बड़ा सवाल—इन मजदूरों का क्या होगा? प्रशासनिक कार्रवाई के बीच सबसे ज्यादा मार पड़ी है उन गरीब मजदूरों पर,जिनकी जिंदगी का एकमात्र सहारा यही काम था। यमुना किनारे बसे हजारों परिवार आज अचानक बेरोजगार हो गए हैं। एक मजदूर की आंखों में आंसू और आवाज में गुस्सा— “हम चोर नहीं हैं, मजदूर हैं…मेहनत करके पेट पालते थे, अब वो भी छिन गया।” दूसरे मजदूर ने कहा—”सुबह घर से निकलते हैं काम की तलाश में, लेकिन शाम को खाली हाथ लौटते हैं। बच्चों के लिए दाल-रोटी तक मुश्किल हो गई है।”
महिलाओं का दर्द—“बच्चों का भविष्य अंधेरे में”
एक महिला मजदूर ने बताया— “बरसात आने वाली है, घर की छत डालनी थी… अब सब अधूरा रह जाएगा। बच्चे स्कूल छोड़ने की बात कर रहे हैं, फीस देने के पैसे नहीं हैं।”यमुना, जिसे ये लोग मां की तरह पूजते हैं, वही आज इनके लिए मजबूरी और दर्द का कारण बन गई है।
“मशीनें चलेंगी तो मजदूर भूखे मरेंगे”
मजदूरों का आरोप है कि बड़े ठेकेदारों की मशीनें (जेसीबी/पोकलैंड) काम कर रही हैं, लेकिन गरीब मजदूरों को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है। “सरकार मशीनों से काम कराएगी तो हम जैसे मजदूर कहां जाएंगे?”
आंदोलन की चेतावनी—“अब चुप नहीं बैठेंगे”
गुस्साए मजदूरों और उनके संगठनों ने साफ कहा है—या तो रोजगार दो या वैध खनन का पट्टा दो वरना वे जल्द ही सड़कों पर उतरकर डीएम आवास का घेराव करेंगे और बड़ा आंदोलन करेंगे।
जमीनी हकीकत: कानून बनाम भूख
एक तरफ प्रशासन अवैध खनन रोकने के अपने अभियान को बड़ी सफलता बता रहा है, तो दूसरी तरफ जमीन पर सच्चाई यह है कि—घाट बंद हुए, लेकिन हजारों घरों के चूल्हे भी ठंडे पड़ गए। यमुना किनारे इस समय अजीब सा सन्नाटा है—न मशीनों की आवाज, न मजदूरों की हलचल…बस भूख, बेरोजगारी और गुस्से की खामोशी। यह खबर जमीनी पड़ताल और स्थानीय मजदूरों की आवाज पर आधारित है, जहां सख्ती के बीच इंसानी संकट सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा है।
