वोट किसी नेता पर किया गया एहसान नहीं, यह देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा कर्तव्य है। मतदान केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है यह तय करने का अवसर है कि हमारे सार्वजनिक जीवन में कानून का सम्मान होगा या बाहुबल का, ईमानदारी का स्थान होगा या भ्रष्टाचार का, और समाज को जोड़ने वाली राजनीति होगी या बाँटने वाली।
हर चुनाव के बाद हम परिणामों पर बहस करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि उस परिणाम की जड़ में हमारा अपना एक-एक फैसला होता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी यही है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। ताकत इसलिए कि सत्ता की चाबी जनता के हाथ में है, और कमजोरी इसलिए कि यही चाबी जब लापरवाही, लालच या डर में गलत हाथों में चली जाती है, तो उसकी कीमत पाँच साल तक पूरा समाज चुकाता है। और उन पांच सालों में जो युवाओं का भविष्य बर्बाद होता है उसका फिर कोई समाधान नहीं रहता।
आज की जागरूक जनता को समझना होगा कि वोट एहसान नहीं, जिम्मेदारी है।
चुनाव के समय अक्सर ऐसा माहौल बना दिया जाता है मानो उम्मीदवार जनता से वोट माँगकर उस पर कृपा कर रहा हो, या मतदाता किसी को वोट देकर उस पर उपकार कर रही हो। दोनों ही सोच गलत हैं। नेता जनता का सेवक है और मतदाता व्यवस्था का मालिक। जब हम किसी को वोट देते हैं, तो उसे अपनी सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, कानून-व्यवस्था और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में फैसले लेने का अधिकार सौंपते हैं। यह अधिकार किसी को बिना परखे दे देना वैसा ही है जैसे अपने घर की चाबी किसी अजनबी को सौंप देना।
इसीलिए मतदान को केवल एक दिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर किया गया निर्णय होना चाहिए। हमारा वोट आज की सरकार ही नहीं चुनता, वह कल के समाज की दिशा भी तय करता है।
हमने पहले भी देखा है, फिर भी भूल जाते हैं बिना सोचे समझे किए गए अपने वोट के इस्तेमाल का प्रयोग करने के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में हमने चुनाव परिणाम देखे हैं। हमने यह भी देखा है कि कई बार नतीजे रातों-रात पलट जाते हैं, और बाद में उसी जनता को पछताते भी देखा है जिसने कभी उत्साह वश , भ्रम वश, लालच में आकर किसी को चुना था। किसी खाते में आए हुए पैसों या लिफाफे पाकर लालच में वोट दिया, किसी ने आपराधिक दबाव में, किसी ने इसलिए कि उसे सामने कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखा, और कुछ ने अपने ही फैसले में दुविधा के कारण गलत व्यक्ति को चुन लिया। फिर वही लोग जब बड़े पदों पर पहुँचे, तो जनता के सामने सिर्फ पछतावा बचा। वही जानता उन लोगों से क्या न्याय की उम्मीद करें जो खुद अपराधिक बैकग्राउंड से आते हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार और बेईमानी से अकूत संपत्ति बनाई है उनसे ईमानदारी न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
सवाल यह है कि क्या यह सब हमें अर्थात सम्मानित वोटर को पहले पता नहीं होता? अधिकतर मामलों में पता होता है। उम्मीदवार का इतिहास, उसकी छवि, उस पर लगे आरोप, उसके इलाके में उसकी पहचान, ये बातें कोई छिपी हुई नहीं होतीं। फिर भी हम “इस बार देख लेते हैं”, “हमारा तो कोई नहीं सुनता” या “सब एक जैसे हैं” “मजबूरी है कोई विकल्प नहीं है” जैसी बातें कहकर आँखें मूँद लेते हैं। यही उदासीनता सबसे बड़ा खतरा है। पछताने से बेहतर है कि वोट डालने से पहले ही सोच लिया जाए।
आँकड़े क्या कहते हैं
चुनाव सुधारों पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) हर चुनाव के बाद विजयी उम्मीदवारों के शपथ-पत्रों का विश्लेषण करती है। उसके विश्लेषणों में लगातार यह तथ्य सामने आता रहा है कि विधायकों और सांसदों का एक बड़ा हिस्सा अपने ऊपर आपराधिक मामले घोषित करता है। देशभर के विधायकों पर किए गए एक हालिया विश्लेषण में करीब 4,000 विधायकों में से लगभग 44 प्रतिशत ने आपराधिक मामले घोषित किए थे, और इनमें से एक बड़ी संख्या के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और महिलाओं के विरुद्ध अपराध जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। इसी साल हुए कुछ राज्यों के चुनावों के बाद भी नवनिर्वाचित विधायकों में ऐसे मामलों की हिस्सेदारी चर्चा में रही।
इसके साथ यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह समस्या किसी एक राज्य या किसी एक दल तक सीमित नहीं है। अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग दलों के जनप्रतिनिधि इन आँकड़ों में शामिल रहे हैं। इसलिए यह मुद्दा किसी दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का है देश के भविष्य का है।
माना आरोप और दोषसिद्धि में फर्क होता है।
निष्पक्ष रहने के लिए एक बात साफ कहनी जरूरी है। ADR के आँकड़े शपथ-पत्र में घोषित लंबित मामलों पर आधारित होते हैं। किसी पर मुकदमा दर्ज होने का अर्थ यह नहीं कि वह दोषी सिद्ध हो चुका है। हमारी न्याय-व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जब तक अदालत में दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। कई बार राजनीतिक कारणों से भी झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं, और जन-आंदोलनों में भाग लेने वाले कई ईमानदार लोगों पर भी धरना-प्रदर्शन से जुड़े मामले बन जाते हैं।
इसलिए जागरूक मतदाता का काम सिर्फ “कितने केस” गिनना नहीं है। उसे यह देखना चाहिए कि मामले किस प्रकृति के हैं। क्या वे जनहित के आंदोलन से जुड़े हैं, या हिंसा, जमीन कब्जा, हत्या उगाही, धोखाधड़ी, शोषण
रेप,भ्रष्टाचार और महिलाओं के प्रति गंभीर अपराध जैसे गंभीर आरोपों से? अदालत में किस चरण पर हैं, और क्या आरोप तय हो चुके हैं? यही विवेक एक सुलझे हुए लोकतंत्र की पहचान है जनता को जागरूक होना होगा तकनीकी और वैश्वीकरण के इस युग में खुद के विचारों को और सोचने समझने की क्षमता को विस्तारित करना होगा।
जब सत्ता बाहुबल और भ्रष्टाचार के हाथ में जाती है
जब नेतृत्व ऐसे लोगों के पास पहुँचता है जिनकी पहचान माफिया-प्रभाव, दबंगई या भ्रष्टाचार से जुड़ी हो, तो उसके परिणाम चुनाव तक सीमित नहीं रहते। कानून-व्यवस्था कमजोर हो सकती है, क्योंकि जिन पर कानून लागू कराने की जिम्मेदारी होती है, वही उसके दबाव में आ जाते हैं। कई बार तो ऐसी पार्टियों अपने एक विशेष जाति और समुदाय के लोगों की विशेष भारतीय करती है और अपनी पर्सनल सुरक्षा व्यवस्था तैयार करती है जो अन्य चुनाव में परिणाम बदलने में उनकी सहायता कर सके। गलत निर्णय और जनता की लापरवाही से सरकारी संस्थाओं पर जनता का भरोसा घटता है। ईमानदार अधिकारी और कर्मचारी हतोत्साहित होते हैं। ठेके, नौकरियाँ और योजनाओं का लाभ योग्यता के बजाय पहुँच और सिफारिश से, उन नेताओं के चाहते लोगों को ही मिलने लगता है। विकास के अवसर कुछ चुनिंदा लोगों तक सिमट जाते हैं, और आम नागरिक यह मान बैठता है कि उसकी बात कहीं नहीं सुनी जाएगी।
सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि समाज में गलत को सही और सही को बेवकूफी समझा जाने लगता है। जब बच्चे देखते हैं कि बाहुबल से सम्मान और पद मिलता है, तो ईमानदारी और मेहनत का मूल्य उनकी नजर में घट जाता है। यह नुकसान किसी एक चुनाव में नहीं, पूरी एक पीढ़ी के चरित्र में दिखाई देता है। और सामाजिक नैतिकता का एक गलत उदाहरण तय हो जाताहै।
जाति और पहचान का खेल राजनीति का खतरा
दूसरा बड़ा खतरा है।
वह राजनीति है जो समाज को जाति, मजहब या क्षेत्र के आधार पर खाँचों में बाँटकर अपना फायदा देखती है। जिस नेता के पास अपने काम का कोई हिसाब नहीं होता, वह अक्सर पहचान का सहारा लेता है वह अक्सर समाज में जाति व्यवस्था के बंटवारे का सहारा लेते हैं वह दिखाते हैं कि वह किसी विशेष जाति के नेता है। वह मतदाता को यह नहीं बताता कि उसने क्या किया या आगे क्या करेगा, बल्कि यह याद दिलाता है कि “तुम किस जाति या समुदाय के हो।”
ऐसी राजनीति नागरिकों को समान अधिकारों वाले साथी के बजाय अलग-अलग खेमों के सदस्य के रूप में देखने लगती है और समाज में जातिवाद की खाई और ज्यादा बढ़ जाती है। पड़ोसी के बीच अविश्वास बढ़ता है, और जो ऊर्जा सड़क, पानी, शिक्षा और रोजगार, सुरक्षा जैसे सवालों पर लगनी चाहिए थी, वह आपसी खींचतान में खर्च हो जाती है। जिन युवाओं को पढ़ लिखकर देश के भविष्य का निर्माण करना होता है वह इन जाति पाति की लड़ाई में अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं।
अपनी जाति या समुदाय के किसी योग्य और ईमानदार व्यक्ति का समर्थन करना गलत नहीं है, लेकिन केवल जाति के नाम पर अयोग्य या दागी व्यक्ति को चुन लेना अपने ही समाज के साथ अन्याय है।
राजनीति समाज की सेवा का रास्ता है और कुछ राजनीतिक दल के प्रतिनिधि सेवा के इस रास्ते को परिवार की सेवा में बदल देते है किसी परिवार में जाति धर्म के नाम पर अपने ही परिवारों को यह कह कई पीढियां को राजनीति में आगे बढ़ाने के प्रावधान बनाए जातेहैं।
राजनीति की शुरुआत समाज और जनता की सेवा के उद्देश्य से हुई थी परंतु कुछ राजनीतिक दलों ने इसे बदल दिया है। जनता को पारिवारिक राजनीति और ऐसे नेताओं से भी सतर्क रहना होगा। स्वतंत्रता आंदोलन से निकले अनेक नेताओं ने अपना घर-परिवार, सुख-सुविधा और कई बार प्राण तक देश के लिए न्योछावर किए आजादी की लड़ाई के बाद हजारों की संख्या में ऐसे राजनेता है जो अपने ईमानदारी देश के प्रति अपने समर्पण के लिए प्रसिद्ध रहे। आज बहुत-से लोगों को यह दिखाई देता है कि राजनीति धीरे-धीरे पारिवारिक या निजी सेवा में सिमटती जा रही है। टिकट, पद और संसाधन एक ही परिवार या कुछ चुनिंदा लोगों के बीच घूमते रहते हैं, राजनीति में कार्यरत आम कार्यकर्ता और योग्य युवा पीछे रह जाते हैं।
इन सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक गलत फैसले से जनता को पाँच साल तक वादों, भाषणों और झूठी उम्मीदों के सहारे उलझाए रखा जाता है। समस्याएँ वहीं की वहीं रहती हैं, और अगला चुनाव आते ही फिर नए नारे सामने आ जाते हैं। इसलिए यह देखना जरूरी है कि कोई उम्मीदवार वास्तव में जनसेवा के लिए आया है या सत्ता को अपनी और अपने परिवार की संपत्ति बढ़ाने का साधन बनाना चाहता है। अपने लोगों को बाहुबली बनाने के लिए अपने लोगों को आर्थिक लाभ देने के लिए और अपने लोगों को ही गरीबी और रोजगार देने के लिए।
आज के समय को देखते हुए विभिन्न मीडिया चैनल, समाचार पत्रों,समाज के जागरूक लोगों से यह आग्रह है कि “मतदाता को कठघरे में खड़ा न करें, जागरूक करें”।
फिर भी हर मतदाता के फैसले को गलत मंशा से जोड़ना उचित नहीं होगा। लोग कई कारणों से मजबूर होकर वोट देते हैं। कहीं दबंगों का डर होता है, कहीं रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किसी स्थानीय ताकत पर निर्भरता, कहीं पुराना भरोसा, तो कहीं सामने मौजूद विकल्पों की कमी। गरीबी और अशिक्षा भी कई बार लोगों को तात्कालिक लाभ के प्रलोभन की ओर ले जाती है। हम बदले हमारी सोच बदले समाज बदले यह हर लोकतंत्र के सिपाही का कर्तव्य है।
आज जरूरी है मतदाताओं के फैसलों की आलोचना से बचते हुए उनके बीच जागरूकता और भरोसा बढ़ते हुए उन्हें सही रास्ता दिखाएं। जब तक नागरिक यह महसूस नहीं करेंगे कि उनका एक वोट सचमुच फर्क डालता है जब तक जनता अपने उंगली में लगी हुई नीली शाही का अर्थ और दायित्व नहीं समझती तब तक हमें उसके बीच जाकर जागरूकता फैलानी होगी। जनता को यह समझना होगा उसके एक फैसले से यह तय हो जाता है कि “उनकी सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित है”परिस्थितियों कठिन है सुझाव बहुत है बदलाव की गति धीमी है पर रास्ता असंभव नहीं है। आज की परिस्थिति में समाज के उत्थान का ध्यान रखते हुए राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि वे साफ-सुथरी छवि और काम करने वाले लोगों को टिकट दें। मतदाता तभी बेहतर चुन पाएगा जब उसके सामने बेहतर विकल्प होंगे।
उम्मीदवार को कैसे परखें
एक जागरूक मतदाता के रूप में हम कुछ सरल बातें अपना सकते हैं।
पहला, उम्मीदवार का शपथ-पत्र पढ़ें। हर उम्मीदवार को नामांकन के समय अपनी संपत्ति, शिक्षा और लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी शपथ-पत्र में देनी होती है। यह जानकारी निर्वाचन आयोग और ए डी आर जैसी संस्थाओं के माध्यम से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होती है। आजकल मोबाइल पर भी ये जानकारी देखी जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार राजनीतिक दलों को भी अपने उम्मीदवारों का आपराधिक इतिहास सार्वजनिक करना होता है, और यह भी बताना होता है कि उन्होंने साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्ति के बजाय उसी उम्मीदवार को क्यों चुना।
दूसरा, काम का रिकॉर्ड देखें। अगर वह पहले जनप्रतिनिधि रह चुका है, तो उसके कार्यकाल में क्षेत्र में क्या बदला, विधानसभा या संसद में उसकी उपस्थिति कैसी रही, उसने जनता के सवाल कितनी बार उठाए, और स्थानीय निधि का उपयोग कैसे किया। शिक्षा चिकित्सा और बच्चों के भविष्य के लिए उसने क्या किया केवल उद्घाटन के शिलापट्ट नहीं, जमीन पर दिखने वाला काम देखें।
तीसरा, चरित्र और व्यवहार पर ध्यान दें। उम्मीदवार का अपने इलाके में व्यवहार कैसा है? क्या वह आम लोगों के लिए सुलभ है, या केवल चुनाव के समय दिखाई देता है? क्या उसके आसपास के लोग कानून का सम्मान करते हैं?
चौथा, अफवाहों और प्रलोभन से बचें। सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली बातें हर बार सच नहीं होतीं। कई राजनीतिक दल एक विशेष टीम बनाकर के गलत अफवाहे अपने चुनावी लाभ के लिए फ्लेट हैं और आप लगातार प्राप्त हो रहे मैसेज से भ्रमित हो जाते हैं, किसी भी जानकारी की पुष्टि विश्वसनीय स्रोतों से कर लें। उपहार, पैसे या शराब के बदले वोट देना अपने ही भविष्य का सौदा करना है।
पाँचवाँ, अपने परिवार और पड़ोस से चर्चा करें। अच्छे फैसले अक्सर खुली बातचीत से निकलते हैं। बुजुर्गों का अनुभव, युवाओं की जानकारी और महिलाओं का दृष्टिकोण, तीनों मिलकर बेहतर निर्णय में मदद करते हैं।
वोट के बाद की जिम्मेदारी
लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका मतदान केंद्र से बाहर निकलते ही खत्म नहीं हो जाती। चुने गए प्रतिनिधि से सवाल पूछना, उसके काम का हिसाब माँगना और अच्छे काम की सराहना करना भी हमारा कर्तव्य है। जनप्रतिनिधि से मिलने के लिए जनसुनवाई, पत्र, ज्ञापन और सोशल मीडिया जैसे साधन हमारे पास हैं। जब जनता सक्रिय रहती है, तब प्रतिनिधि भी सतर्क रहता है।
इसी तरह, अगर कोई प्रतिनिधि वादे पूरे नहीं करता, या अपने पद का दुरुपयोग करता है, तो अगले चुनाव में उसे जवाब देना पड़े, यह जनता को ही सुनिश्चित करना है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी सजा और सबसे बड़ा पुरस्कार, दोनों मतपत्र के रूप में जनता के पास होते हैं।
आज हम जो फैसले ले रहे हैं, उनके परिणाम हमारे बच्चों और उनके बच्चों को भुगतने होंगे। जब वे इतिहास पलटकर देखेंगे, तो पूछेंगे कि हमने किसे चुना, क्यों चुना, और हमारे निर्णय से देश और समाज को क्या लाभ या हानि हुई। अच्छा हो या बड़ा इतिहास हमेशा लिखा जाता है उस दिन हमारे पास यह कहने का विकल्प नहीं होगा कि “हमें पता नहीं था” या “हम मजबूर थे”।
इसलिए अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते समय सिर्फ आज की जरूरत नहीं, अपने बच्चों की शिक्षा, उनके रोजगार, उनकी सुरक्षा स्वाबलंबन और उनके भविष्य को भी सामने रखें। यह सोचें कि क्या जिसे हम चुन रहे हैं, वह हमारे बच्चों के लिए बेहतर स्कूल, सुरक्षित सड़कें, साफ प्रशासन और अवसरों से भरा समाज बनाने की क्षमता और नीयत रखता है।
लोकतंत्र कोई तैयार व्यवस्था नहीं, जिसे एक बार पाकर हम निश्चिंत हो जाएँ। वह हर चुनाव में नागरिकों के विवेक, साहस और जागरूकता से नए सिरे से गढ़ा जाता है। अपराध, भ्रष्टाचार, जातिवाद और परिवारवाद जैसी समस्याओं का इलाज किसी एक कानून या एक नेता के पास नहीं, बल्कि जागरूक मतदाताओं के सामूहिक निर्णय में है। देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रहे आजादी के इतने वर्ष बाद हम सबको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
इसलिए मतदान से पहले सोचिए, जानिए, परखिए और फिर निर्णय लीजिए। न दबाव में आइए, न लालच में, न अफवाह में। अपना प्रतिनिधि अपने बच्चों के भविष्य और देश के भविष्य को देखकर चुनिए। आपका वोट केवल आज की सरकार नहीं चुनता, वह कल के समाज की दिशा भी तय करता है।
तकनीकी युग में ,सोशल मीडिया के युग मेंऔर पूरे विश्व की खुली खिड़कियों वाले वैश्वीकरण के युग में आपके हाथों में जानकारी का सैलाब तो है ही आपकी उंगलियों में भविष्य का फैसला है।निश्चित रूप से आपका आज का फैसला आपको भविष्य में पछताने से बचा सकता है देश की सत्ता को अपराधियों से बचा सकता है आपके बच्चों को उज्जवल भविष्य की राह दिखा सकता है।
कृपया सोचे समझे और मनन करें।
लेखक: रीना त्रिपाठी,लखनऊ।
महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष सर्वजन हिताय संरक्षण समिति।
