दरारों पर टिकी सत्ता, बाँटना इतना आसान क्यों है?
चुनाव जीतने का सबसे आसान रास्ता है समाज को जाति और उपजातियों में बाँटना, भावनाएँ भड़काना, झूठे वादे करना और फिर समाज को टुकड़ों में लहूलुहान छोड़ देना।
इतिहास के पन्ने गवाही देते रहे कि सत्ता किसी की भी हो सबसे कठिन, लेकिन श्रेष्ठ मार्ग है समाज को जोड़ना, विकास करना, युवाओं को भविष्य की स्पष्ट दृष्टि देना और पूरे समाज के लिए बिना किसी भेदभाव के काम करना। यही नेतृत्व की असली कसौटी है।
आप के मन में भी प्रश्न आता होगा की बँटवारे की राजनीति इतनी आकर्षक क्यों है?
बाँटने की राजनीति इसलिए लुभाती है कि इसमें मेहनत कम और नतीजा तुरंत दिखता है। स्कूल, अस्पताल, सड़क और रोज़गार का काम, बरसों की योजना, योजनाबद्ध विकास, ईमानदार अमल और धैर्य माँगता है और इन सब में जरा सी देर या त्रुटि होने पर आलोचना का अंबार लगता है सो अलग। इसके उलट, मतदाता को यह यक़ीन दिला देना कि “तुम्हारी तकलीफ़ का कारण दूसरी जाति या दूसरा समुदाय है”, कुछ भाषणों और कुछ नारों से हो जाता है आज के सोशल मीडिया के युग में भावनाएं भड़काना ज्यादा आसान है अफवाहें फैलाना आसान है बार-बार बोले जाने वाले झूठ को सच बना देना आसान है।
जैसा कि हम सब जानते है हर समय समाज में डर और गुस्सा सबसे तेज़ फैलने वाली भावनाएँ हैं। जो नेता इन्हें जगा देता है, उसे अपने काम का हिसाब नहीं देना पड़ता, हितैषी का डर जवाबदेही पर भारी पड़ता है और वह सवालों को ही दुश्मन ठहरा देता है।
इस रास्ते की सबसे बड़ी चालाकी यह है कि वह जनता की असली समस्याओं को पीछे धकेल देता है। जब चर्चा इस पर टिक जाए कि “कौन किसका हक़ छीन रहा है”, तब कोई यह नहीं पूछता कि गाँव का स्कूल बिना शिक्षक के क्यों है, ज़िला अस्पताल में दवा क्यों नहीं है, या पढ़ाई पूरी कर चुका नौजवान नौकरी के लिए दर-दर क्यों भटक रहा है। बँटा हुआ समाज सवाल नहीं पूछता, आपस में उलझा रहता है और यही उलझाव बँटवारे की राजनीति की असली पूँजी है।
जाति भारतीय समाज की एक ऐतिहासिक सच्चाई है। सदियों की ग़ैर-बराबरी और शोषण को नकारना न सच्चाई के साथ न्याय है, न समाज के साथ। इसीलिए संविधान ने आरक्षण और सामाजिक न्याय की व्यवस्था दी, ताकि जो पीछे छूट गए, उन्हें बराबरी तक पहुँचने का मौक़ा मिले। वंचितों की आवाज़ उठाना और उनके हक़ के लिए लड़ना लोकतंत्र की ज़िम्मेदारी है।
पर वंचित की आवाज़ उठाना एक बात है और जाति को चुनावी हथियार बना लेना दूसरी। पहली में लक्ष्य न्याय होता है, दूसरी में लक्ष्य सत्ता। जब हर जाति के भीतर नई उपजातियाँ खोजी जाती हैं, हर उपजाति को दूसरी से असुरक्षित बताया जाता है और हर वर्ग को यह समझाया जाता है कि उसका भला केवल “अपने” नेता से होगा, तब समाज के टुकड़े-टुकड़े होते जाते हैं। टुकड़ों में बँटा समाज कमज़ोर होता है, और कमज़ोर समाज में सबसे ज़्यादा नुक़सान उसी को होता है जिसके नाम पर राजनीति की जा रही थी। नेता चुनाव जीत जाता है, या कई पीढियां तक जितना रहता है पर गाँव-मोहल्लों में रिश्तों की दरार बरसों तक पीढ़ियों तक बनी रहती है। जिन पड़ोसियों ने कभी साथ त्योहार मनाए थे, वे एक-दूसरे को शक की नज़र से देखने लगते हैं।
झूठे वादे और टूटता भरोसा
बँटवारे की राजनीति के साथ झूठे वादे लगभग हमेशा चलते हैं। जब जनता की भावनाएँ भड़की हों, तो वादों की जाँच-पड़ताल कम होती है। सबको नौकरी, सबको घर,सब कुछ मुफ़्त जैसे वादे ऐसे माहौल में आसानी से बिक जाते हैं। चुनाव के बाद हक़ीक़त सामने आती है, तो जवाबदेही से बचने के लिए नया दुश्मन खड़ा करना पड़ता है। इस तरह झूठ और नफ़रत एक-दूसरे को खुराक देते रहते हैं।
इसका सबसे गहरा नुक़सान लोकतंत्र पर भरोसे को होता है। जब लोग बार-बार ठगे जाते हैं, तो वे मान लेते हैं कि “सब नेता एक जैसे हैं” और या तो मतदान से दूर हो जाते हैं या उसी भावनात्मक नारे के पीछे चल पड़ते हैं जो अगली बार फिर उन्हें ठगेगा। यह निराशा किसी एक दल की हार नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे की हार है।
आज देश की सबसे बड़ी पूँजी उसके युवा हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुमानों के आधार पर 2026 में भारत की युवा आबादी करीब 36.8 करोड़ है, जो दुनिया में सबसे बड़ी है। यह “जनसांख्यिकीय लाभांश” तभी वरदान बनेगा जब इन हाथों को काम और इन आँखों को सपने मिलें। अगर यही ऊर्जा बेरोज़गारी, निराशा और नफ़रत की भेंट चढ़ गई, तो यही लाभांश बोझ बन सकता है। सड़कों पर कभी मशाल जुलूस तो कभी विरोध प्रदर्शन में असंतोष से भरे युवा हमे रोज दिखते है न्याय की आस में रोजगार की चिंता में भटकता युवा।
पढ़े-लिखे नौजवान और बेटियाँ बड़ी उम्मीद से शिक्षा लेते हैं, पर नौकरी के मोर्चे पर उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है पैसे कमाने के इस प्रकार भटकते युवा कई बार गलत रास्ते भी अपना लेते हैं। इस तरह के नौजवान से यह कहना कि “तुम्हारी परेशानी की वजह दूसरी जाति है” उसके साथ दोहरा अन्याय है। पहले व्यवस्था ने उसे रोज़गार नहीं दिया, फिर राजनीति ने उसका ग़ुस्सा असली कारणों से हटाकर किसी निर्दोष पड़ोसी की ओर मोड़ दिया। आजकल का युवा कभी यूजीसी के नाम पर तो कभी एससी एसटी एक्ट के नाम पर इस नफरत की लड़ाई में एक दूसरे से लड़ने में व्यस्त है। क्यों ऐसा नहीं होता कि उचित शिक्षा मिलने के बाद उचित रोजगार भी मिले। अर्थ के इस युग में बेरोजगारी जहां अर्थव्यवस्था में सहयोग स्वरोजगार के माध्यम से हो या किसी अन्य बहुत आवश्यकहै।
राजनीतिज्ञ से युवाओं को आज भाषण नहीं, भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहिए। उन्हें जानना है कि उनके ज़िले में कौन-से उद्योग आएँगे, कौशल की कौन-सी पढ़ाई उन्हें रोज़गार दिलाएगी, परीक्षाएँ समय पर और पारदर्शी ढंग से होंगी या नहीं, और स्टार्टअप शुरू करने वाले को आसान कर्ज़ और सहयोग मिलेगा या नहीं। जो नेता इन सवालों के ठोस जवाब देता है, वही युवाओं के साथ सच्चा रिश्ता बनाता है। असंतोष से भरा युवा जब राजनीतिक चश्मे को पहनकर निकलता है तो उसे झूठे वादे या फिर वादों को झूठे रंगों से सजाकर राजनीति में परोसा जाता है।
आप भी अक्सर सोचते होंगे समाज को जोड़ना कठिन क्यों है ?और ज़रूरी क्यों है?
जोड़ने की राजनीति कठिन है क्योंकि उसमें तुरंत तालियाँ नहीं मिलतीं। जो नेता कहता है कि “मैं सबका हूँ”, उसे हर पक्ष से सवाल सुनने पड़ते हैं। उसे उन फ़ैसलों की क़ीमत चुकानी पड़ती है जिनके नतीजे पाँच साल बाद दिखेंगे। उसे अपने ही समर्थकों से यह कहने का साहस रखना पड़ता है कि “नफ़रत से कोई समस्या हल नहीं होती”।
फिर भी यही रास्ता टिकाऊ है। जिस इलाक़े में सड़क बनती है, वहाँ जाति नहीं पूछी जाती, सब उस पर चलते हैं। जिस स्कूल में अच्छा शिक्षक आता है, उसमें हर वर्ग का बच्चा पढ़ता है। जिस उद्योग से रोज़गार मिलता है, उसमें हर समुदाय का युवा काम करता है। विकास अपने स्वभाव से ही जोड़ने वाली चीज़ है। वह एक की जीत को दूसरे की हार नहीं बनाता, बल्कि पूरे समाज का दायरा बढ़ाता है।
जोड़ने का अर्थ यह भी नहीं कि भेदभाव और अन्याय पर आँखें मूँद ली जाएँ। सच्चा समन्वय तभी बनता है जब हर वर्ग को यह भरोसा हो कि उसके साथ न्याय हो रहा है। इसलिए जोड़ने वाले नेतृत्व को वंचितों की आवाज़ भी सुननी होती है और समाज के बाक़ी हिस्सों को साथ भी रखना होता है। यह संतुलन साधना ही असली नेतृत्व की कला है जो लगभग वर्तमान समय में गायब होती जा रही है।
नेतृत्व की असली कसौटी
किसी नेता की परख इससे नहीं होती कि उसकी रैली में कितनी भीड़ आई या उसने कितना ज़ोरदार भाषण दिया। परख इससे होती है कि उसके कार्यकाल में समाज में भरोसा बढ़ा या घटा, युवाओं के हाथ में अवसर आए या निराशा, और आम आदमी की ज़िंदगी आसान हुई या कठिन।
चुनाव जीतना साधन है, साध्य नहीं। साध्य है ऐसा समाज बनाना जिसमें हर नागरिक सम्मान, सुरक्षा और अवसर के साथ जी सके। जनता को अपना प्रतिनिधि चुनते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए उसे यह भरोसा कौन दे रहा है।
इतिहास गवाह है कि जो समाज बाँटने वालों के हाथों में गया, वह लंबे समय तक उस घाव को भरने में लगा रहा और जिसने जोड़ने वालों को चुना, वह आगे बढ़ा। राष्ट्र-निर्माण के लिए एकता कोई भावुक आदर्श नहीं, एक व्यावहारिक ज़रूरत है, क्योंकि बँटा हुआ समाज न निवेश आकर्षित कर पाता है, न प्रतिभा को रोक पाता है, न अपने भविष्य पर भरोसा कर पाता है।
मतदाता की ज़िम्मेदारी
लोकतंत्र में नेता वैसा ही बनता है जैसा समाज उसे बनने देता है। अगर जनता नारों पर तालियाँ बजाएगी और काम का हिसाब नहीं माँगेगी, तो नेता को आसान रास्ता ही चुनना पड़ेगा। इसलिए सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी मतदाता की है। वह हर चुनाव में कुछ सीधे सवाल पूछे, पिछली बार जो वादा हुआ था, वह पूरा हुआ या नहीं? हमारे इलाक़े में कितने रोज़गार बने? स्कूल-अस्पताल की हालत कैसी है? क्या यह नेता सबके लिए बोलता है या केवल कुछ के लिए?
जब मतदाता जाति और भावना से ऊपर उठकर प्रदर्शन के आधार पर फ़ैसला करने लगता है, तो राजनीति को भी अपना तरीक़ा बदलना पड़ता है। तब बँटवारे का नारा महँगा पड़ता है और जोड़ने का काम फ़ायदे का सौदा बन जाता है। यह बदलाव किसी एक चुनाव में नहीं आता, पर हर जागरूक वोट इसकी नींव में एक ईंट रखता है।
आज भारत की जनता को तथा यहां के राजनीतिक समाज के उत्थान को चाहने वालों को यह समझना होगा कि आसान रास्ता पल भर की जीत देता है और पीढ़ियों का घाव छोड़ जाता है। कठिन रास्ता धीमा है, पर वह समाज को मज़बूत, युवाओं को आत्मविश्वासी और देश को सशक्त बनाता है। आज जब करोड़ों युवा अपने भविष्य की ओर उम्मीद से देख रहे हैं, तब देश को ऐसे नेतृत्व की ज़रूरत है जो उनसे कहे, “हम राजनीति समाज के हित में करने आए हैं ,हम तुम्हें बाँटने नहीं आगे बढ़ाने आए हैं।” ऐसा नेतृत्व ही चुनाव से आगे जाकर इतिहास में अपनी जगह बनाता है।
अतः मतदाताओं को चाहिए कि वह जागरूक बने अपराधियों को तथा कुछ सिद्ध मानसिकता से ग्रसित होकर राजनीति करने वालों से दूरी बनाएं वह चुने जिससे देश का विकास हो, वह चुने जिससे आपके बच्चे पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन कर सके, तोड़ना नहीं जोड़ना चुने।
@रीना त्रिपाठी ,महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष , सर्वजन हिताय संरक्षण समिति।
दरारों पर टिकी सत्ता, बाँटना इतना आसान क्यों है?चुनाव जीतने का सबसे
