–अखण्ड कुमार पाण्डेय
अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, लखनऊ
जिला न्यायालयों में गलत तिथि अपडेट और अधूरे आदेशों से बढ़ रही परेशानी
देश में न्यायपालिका के डिजिटलीकरण को आधुनिक व्यवस्था की पहचान बताया जा रहा है, लेकिन कई जिला न्यायालयों में यह व्यवस्था स्वयं न्याय की राह में बाधा बनती दिखाई दे रही है।
कहीं अगली सुनवाई की तिथि पोर्टल पर गलत दर्ज कर दी जाती है, तो कहीं आदेश का केवल एक-दो पृष्ठ ही अपलोड होता है। कई मामलों में पूरा आदेश उपलब्ध ही नहीं होता। परिणामस्वरूप अधिवक्ता और वादकारी दोनों भ्रम की स्थिति में रहते हैं। कभी गलत तिथि के कारण न्यायालय पहुंचना पड़ता है, तो कभी आदेश की प्रति के लिए बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
व्यंग्य यह है कि व्यवस्था को “पेपरलेस” बनाने का दावा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता में लोग पहले ऑनलाइन जानकारी देखते हैं, फिर उसकी पुष्टि के लिए ऑफलाइन दौड़ लगाते हैं। यदि डिजिटल रिकॉर्ड ही भरोसेमंद न हो, तो तकनीक सुविधा के बजाय नई समस्या बन जाती है।
न्याय केवल निर्णय देने से ही नहीं, बल्कि सही और समय पर सूचना उपलब्ध कराने से भी सुनिश्चित होता है। इसलिए आवश्यक है कि न्यायालयों के डिजिटल पोर्टल पर सुनवाई की तिथियां, आदेश और अन्य अभिलेख पूर्ण, सटीक तथा समयबद्ध रूप से अपलोड किए जाएं। इससे अधिवक्ताओं का समय बचेगा, वादकारियों का अनावश्यक खर्च रुकेगा और न्यायपालिका के डिजिटलीकरण का वास्तविक उद्देश्य भी पूरा होगा।
