सैय्यद साहब नहीं रहे, बहेड़ी ने खो दिया क़ौमी एकता का अलमबरदार!

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नागेश गुप्ता
बहेड़ी। सैय्यद साहब नहीं रहे. गन्ना समिति के चेयरमैन रहे सैय्यद शमशाद अली, सैय्यद साहब के नाम से ही इलाके में पहचाने जाते थे.यूँ तो सैय्यद साहब का दुनिया से जाना,क़ुदरत के एक नियम का ही हिस्सा है, लेकिन उनके जाने से बहेड़ी से क़ौमी एकता का अलमबरदार एक मर्दे मुजाहिद रुख़सत हो गया.
कोई 65 बरस पहले बाराबंकी से यहाँ आकर बसे सैय्यद साहब ने अपने संघर्ष शील व्यक्तित्व, साफ गोई और हक़ की आवाज़ बेबाकी से रखने के चलते कुछ ही समय में इलाके में अपनी ख़ास पहचान बना ली थी.लोगों की मदद का उनका जूनून और उनका व्यवहार हर किसी को अपना मुरीद बना लेता.जिसने उनको समझा-बरता,वह हो या फिर वह जो उनसे सियासी इख़्तिलाफ भी रखता हो, उनकी हक़ बयानी का हमेशा क़ायल रहा.कितना भी बड़ी पदवी वाला आदमी हो, या कितने भी लोगों का मजमा, सैय्यद साहब अपनी दमदार आवाज़ में अपनी बात रखने से कभी नहीं चूके. अब उनकी बात से किसी को कुछ बुरा लगे, इसकी फ़िक्र उन्होंने नहीं की.
किसान थे,सो किसानों की समस्याओं से वह बखूबी वाकिफ थे और उनके हल के लिए आवाज़ बुलंद भी करते रहते. दरख्वास्त लेकर परेशान किसान कस्बे में कहीं भी नज़र आया, तो सैय्यद साहब उसके साथ हो लिए,और उसकी समस्या हल कराने के लिए जूझते नज़र आ जाते.किसानों में उनकी ऐसी पैठ बनी कि बहेड़ी गन्ना समिति के चेयरमैन चुने गए.डायरेक्टर के चुनाव में वह उस वक़्त के विधायक से चुनाव जीत गए थे,और फिर दो बार चेयरमैन रहे.शिक्षा के इंतज़ामों को लेकर वह ज़िन्दगी भर काफी फ़िक्रमन्द रहे.लड़कियों की तालीम के लिए इंटर कॉलेज बनाने को उन्होंने एक ज़ोरदार मुहिम चलाई,और फिर ज़िला परिषद की ज़मीन पर सुशीला तिवारी मेमोरियल राजकीय इंटर कॉलेज वजूद में आया.छात्राओं की शिक्षा के लिए एक अदद डिग्री कॉलेज बनाने के लिए भी उन्होंने मुहिम छेड़ी थी.निज़ाम को भेजी गई ढ़ेर सारी दरखवास्तों की कापियाँ उन्होंने सहेज रखी थीं. किसी भी राजनेता या अफसर से मिलने पर वह अपनी यह बात ज़रूर रखते, लेकिन अफ़सोस ज़िन्दगी ने उनको अपने इस सपने को साकार करने की मोहलत नहीं दी.
लोगों की मदद करने में उनका सानी भी मुश्किल से ही मिल पाएगा. कस्बे में डनलप लेकर आए किसान की गाड़ी के भैसे बिदकने से किसी फल के ठेले वाले का नुकसान हो गया,और झगड़ा निपटाने को सैय्यद साहब ने अपनी जेब से पैसा निकाल कर नुकसान की भरपाई कर दी.कैफ़े चलाने वाले दानिश, उनका फोटो देखकर बोला:कुछ रोज़ पहले गुरुद्वारा गेट पर दो लोग झगड़ रहे थे, यह साब वहां पहुंच गए,बीच-बचाव करने की कोशिश नाकाम हुई तो झगडे की वजह पूछी. पता चला झगड़ा 300रूपये को लेकर है, इन्होंने 300रूपये अपनी जेब से निकालकर दिए, और झगड़ा ख़त्म.तमाम मौके ऐसे आए,जब सैय्यद साहब की जेब में किसी के मदद के लिए पैसे नहीं हुए, तो उन्होंने किसी पहचान के दुकानदार से उधार पैसा लेकर ज़रूरतमंद की मदद कर दी,और घर वालों पर यह राज़ तब खुला,जब उधार देने वाले ने घर पर दस्तक दी.
खैर,जैसा दुनिया का उसूल है, जो आया है, उसे जाना भी है. सैय्यद साहब भी चले गए,कल उनको सुपुर्दे खाक़ कर दिया गया,लेकिन उनके जाने से बहेड़ी को सचमुच बहुत नुकसान हो गया.

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