सिरफिरे तहसीलदार को सबक सिखाने के लिए पत्रकार समाज को अपनी अस्मियता को बचाने के लिए लामबंद होने की जरूरत

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यह बहुत ही शर्म की बात है एक अदना सा तहसीलदार एक पत्रकार के साथ इस कदर बदसलूकी कर रहा कि जैसे जंगल राज में भ्रमण कर रहा है। तहसीलदार गलतफहमी में है कि एक पत्रकार को वह गाली देकर बहादुर बन जायेगा। ऐसे आसामाजिक तहसीलदार को समाज में रहने का तौर तरीका मालूम नहीं है। ऐसे बेअंदाज तहसीलदार को सख्त से सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है। ताकि वह लोकतंत्र के दायरे में रहकर आम अवाम से अदब के साथ बात कर अपनी ड्यूटी का निर्वाहन कर सके। उस सिरफिरे तहसीलदार को मालूम होना चाहिए कि प्रदेश के ओजस्वी मुख्यमंत्री के गृह जनपद में रहकर ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहा है, जो असहनीय व निन्दनीय है। ऐसे पृष्ठभूमि वाले तहसीलदार को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर इंसानी सबक सिखाने की आवश्यकता है। इस बहरुपिया तहसीलदार को कड़ी से कड़ी सजा देने के लिए सभी को अभी से तैयार रहने की जरूरत है। प्रदेश के ओजस्वी मुख्यमंत्री के शहर में इस तरह के गाली बाज तहसीलदार को सबक सिखाना अत्यंत आवश्यक है। पत्रकारों और अधिवक्ताओं को ललकारने वाले इस मानसिक बीमार तहसीलदार को उखाड़ फेंकने की जरूरत है। गोरखपुर के पत्रकारों को एक घटना से वाकिफ करा दूं, जो जीडीए कार्यालय में एक बाबू ने पत्रकार से दूर व्यवहार कर दिया था जिसका परिणाम था कि पूरे पत्रकार समूह इकट्ठा होकर उस बाबू का ईंट से ईंट बजा दिया था। इसी तरीके से इस मनचले और सरफिरे तहसीलदार का भी ईंट से ईंट बजाने और सबक सिखाने के लिए लामबंद होने की जरूरत है।

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