प्रेमचंद को साहित्यकार बनाने में प्रयाग का महत्वपूर्ण योगदान- रविनन्दन


प्रयागराज

साहित्य की राजधानी के रूप में पुनः स्थापित हो प्रयागराज प्रोफेसर . उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज के मानविकी विद्याशाखा के तत्वाधान में प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर शुक्रवार को प्रयाग में प्रेमचंद विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार एवं आलोचक रविनन्दन सिंह ने कहा कि प्रेमचंद को साहित्यकार बनाने में प्रयाग का महत्वपूर्ण योगदान रहा । उनकी पहली किताब । कालांतर में प्रेमचंद ने कई कालजयी उपन्यासों की रचना की। प्रेमचंद का पहला उपलब्ध उपन्यास असरारे महाविद था । उनका उपन्यास सोजे वतन राष्ट्रीयता से ओत -प्रोत था। उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों एवं उपन्यासों में न्याय व्यवस्था, एवं सामाजिक व्यवस्था का बखूबी चित्रण किया है। रविनंदनसिंह ने कहा कि इलाहाबाद कभी किसी को छोड़ता नहीं, सब की परीक्षा लेता है। प्रेमचंद को भी इलाहाबाद ने कसौटी पर कसना शुरू किया। तब प्रेमचंद ने यह स्पष्ट किया कि वह उस कुरीति और प्रवृत्ति के खिलाफ हैं जो शोषण करती है। प्रेमचंद ने अपने ऊपर लगे हुए आक्षेपों का सौम्य तरीके से जवाब दिया। रविनंदन सिंह ने कहा कि प्रेमचंद प्रायः प्रयाग आते रहते थे। शहर की प्रतिष्ठित हिंदुस्तानी अकादमी जैसे संस्थान उनके साहित्यिक अवदान और आयोजनों से जुड़े रहे हैं। प्रेमचंद की साहित्यिक जीवन का आरंभ 1901 से हो चुका था । वर्ष 1904 के दौरान प्रेमचंद प्रयागराज में शिक्षक प्रशिक्षण ट्रेनिंग के सिलसिले में आए थे फिर बाद में उन्होंने मॉडल स्कूल ट्रेंनिंग कॉलेज में हेड मास्टर के रूप में अपनी सेवाएं दी। इसके उपरांत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक किया। हिंदी साहित्य सम्मेलन के कई अधिवेशन में शामिल हुए। कायस्थ पाठशाला में अपने पुत्रों को शिक्षा दिलाई। उनकी रचनाएं आज जन-जन को उद्वेलित करती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य सत्यकाम ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में राष्ट्र की परिकल्पना झलकती है और हमें उसका अनुसरण करना चाहिए। प्रेमचंद के साहित्य का सबको अध्ययन करना चाहिए। उनकी रचनाओं को जब समाजशास्त्री, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री एवं सुधारक लोग पढ़ते हैं, चिंतन करते हैं तो उसका अलग पर्याय होता है और वह समाज हित में होता है। कुलपति ने मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि एवं उनकी कहानी नमक का दरोगा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि हमें इस बात की कोशिश करनी होगी कि प्रयागराज में उत्कृष्ट रचनाएं हो। प्रयागराज प्रेमचंद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी का नगर फिर बने और यह साहित्य की राजधानी के रूप में पुनः स्थापित हो सके। मुक्त विश्वविद्यालय के सभी विद्या शाखाओं के आचार्यगण से आग्रह किया कि वह मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं पढ़ें। कार्यक्रम में प्रोफेसर रुचि वाजपेई ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद का प्रयागराज से गहरा और ऐतिहासिक नाता रहा है, वह वाराणसी और प्रयाग को अपने साहित्य की दो आंखें मानते थे। उनकी साहित्यिक यात्रा, लेखन और जीवन के कई महत्वपूर्ण पड़ाव इस संगम नगरी से जुड़े हुए थे।
वाचिक स्वागत करते हुए कार्यक्रम के संयोजक प्रोफेसर सत्यपाल तिवारी ने कहा कि प्रयागराज मुंशी प्रेमचंद की रचनात्मक ऊर्जा का मुख्य केंद्र था । प्रेमचंद ने अपने पहले उपन्यास के लेखन के समय अपना नाम नवाब राय इलाहाबादी इस्तेमाल किया था।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम एवं कुलगीत के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन सह आयोजन सचिव डॉ.अब्दुल रहमान ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रोफेसर विनोद कुमार गुप्त ने किया।

डॉ प्रभात चन्द्र मिश्र
जनसंपर्क अधिकारी

B.A न्यूज़ उत्तर प्रदेश क्राइम संवाददाता दीपक कुमार मिश्रा

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