संस्कृति की उपहास उड़ाती सिनेमा समाज को भ्रमित कर रही

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डॉ शीला शर्मा
बिलासपुर,छत्तीसगढ़

सिनेमा हमारे समाज को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार से प्रभावित करती है क्यूंकि सिनेमा से हम अच्छाई और बुराई दोनों ग्रहण करते है सिनेमा समाज के लोगों की मानसिकता को परिवर्तन करने में और समाज के निर्माण में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और वैसे भी सिनेमा को समाज का दर्पण कहा जाता है, जो की आमतौर पर पुरानी प्रकाशित हुई सिनेमाओं पर लागू होती है लेकिन वहीँ आज ‘समाज सिनेमा का दर्पण हो गया है‘ क्यूंकि आज जो सिनेमा में प्रसारित किया जाता है समाज के लोग ठीक वैसा ही करते नज़र आते हैं। पश्चिमी संस्कृति का विस्तार, हेयर स्टाइल, फैशन, एक्शन, बॉडी लैंग्वेज, बात करने के तरीके हर चीज को देख कर उसकी नक़ल करते हैं और ऐसा करने से उन्हें लगता है की यह सब करके वह लोकप्रिय हो जायेंगे। पहले की हिंदी फ़िल्में हमे हमारी संस्कृतियों से, परम्पराओं से, संस्कारों से, परिवार से, समाज से, सभी धर्मों को अन्य धर्मों से जोड़ कर रखती थी। लेकिन वही आज की प्रसारित फिल्मों में इन सब की भूमिका को खत्म करके पश्चिमी संस्कृति को प्रसारित किया जाता है, जहां नग्नता और अश्लीलता, वासना, हिंसा, शराब पीना-जुआ खेलना, अपनी संस्कृति को निचा दिखाना और अपने परम्पराओं एवं सभ्यताओं के विरुद्ध जाकर किसी चीज को प्रसारित किया जाता है, जो की भारतीय समाज पर एक गहरा नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।
हमारे भारत में हिंदी सिनेमा का प्रभाव समाज के लोगों पर इस हद तक हो गया है की लोग स्वयं अपनी सभ्यता और संस्कृतियों से दूर होते चले जा रहें हैं, जहां से उनका सृजन हुआ है। भारतीय मूल के हिंदी सिनेमा में पश्चिमी देशों का प्रभाव इतना अधिक प्रसारित किया जाता है की जिसका नकारात्मक प्रभाव हमारे समाज के लोगों पर अपनी संस्कृतियों के खिलाफ हो रहा है और जिसके कारण भारत की संस्कृति नष्ट होते जा रही है।
हिंदी सिनेमा हमारे समाज पर इतना नकारात्मक प्रभाव डालता जा रहा है की वह लोगों की भावनाओं, विचारों, रहन-सहन को परिवर्तित कर चूका है और हमारे दिमाग में पश्चिमी देशों के रहन-सहन का प्रसार करते जा रहा है, जो की हमारे भारतीय संस्कृति को दाव पर रखकर लोगों का ह्रदय परिवर्तन कर रहें हैं और भारत के लोगों को अपनी संस्कृति से दूर करते जा रहें हैं।
भारतीय हिंदी सिनेमा हमारे देश की युवा पीढ़ी के भीतर अपने मूल संस्कारों एवं संस्कृतियों को बदलकर उनमें पश्चिमी संस्कृतियों का सृजन कर रहें हैं समाज में युवा पीढ़ी कल का भविष्य है, ऐसे में युवा जैसा देखेंगे वैसा ही सीखेंगे और भविष्य में उसका ही प्रसार करेंगे, आज के हिंदी सिनेमा को देखकर युवा पीढ़ी के दिमाग में झूठी धारणाएँ बहुत तेजी से विकसित हो रही है क्यूंकि युवा पीढ़ी फ़िल्मी दुनिया और वास्तविकता के बिच की खाई को महसूस करने में असफल हो जाती है। वर्तमान में अगर हम छत्तीसगढ़ी फिल्मों की बात करें तो यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में कई इंडस्ट्रीयों द्वारा बनाई गई फिल्में फूहड़ और स्तरहीन होते हैं जिनमें इस तरह कहानी संवाद और अभिनय का दर्शन होता है जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति का केवल उपहास करते दिखाई देते हैं। वेशभूषा इस तरह से पहनाया जाता है जो केवल हास्य के पात्र होते है जैसे जींस के ऊपर करधन पहनी हुई अभिनेत्री, इसी प्रकार से छत्तीसगढ़ी लोगों को केवल जुआरी,शराबी, गंजेड़ी के रूप में दिखाया जाता है। जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति को धूमिल करती है। आखिर इस प्रकार के छत्तीसगढ़ के संस्कृति का प्रदर्शन कर ये क्या दिखाने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार के फिल्मों पर रोक लगाना आवश्यक है।

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