सत्य की स्याही, अहिंसा की धार, जब कलम बनी बापू का हथियार

Spread the love

गांधी जयंती के अवसर पर हर वर्ष दो अक्टूबर को हम महात्मा गांधी को सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के प्रतीक के रूप में याद करते हैं। वही संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा इस दिन को वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन गांधी का एक रूप ऐसा भी है जिस पर कम चर्चा होती है।
“एक संपादक और पत्रकार का रूप” गांधी की शक्ति का बड़ा हिस्सा उनकी कलम और अख़बारों में था।महात्मा गांधी एक महान स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ एक कुशल पत्रकार और संपादक भी थे।
उनके विचार, आंदोलन और कार्यक्रम अख़बारों के पन्नों से गुज़रकर ही करोड़ों लोगों तक पहुँचे। यह कहना ग़लत न होगा कि गांधी को समझना हो, तो उनके अख़बारों को समझना ज़रूरी है।
कलम से शुरू हुआ संघर्ष
दक्षिण अफ्रीका के ‘इंडियन ओपिनियन’ से लेकर भारत के ‘यंग इंडिया’ और ‘नवजीवन’ तक गांधी ने पत्रकारिता को कभी पेशा नहीं माना लेखन उनका मिशन था। उनके लिए अख़बार सूचना बेचने का माध्यम नहीं, जनता को शिक्षित और संगठित करने का साधन था।
प्रमुख अखबार के रूप में देखा जाए दक्षिण अफ्रीका में अन्याय के विरुद्ध इंडियन ओपिनियन से शुरू हुआ सफर, गुजराती, अंग्रेज़ी, हिंदी और तमिल कई भाषाओं से होता हुआ
यंग इंडिया, अंग्रेज़ी साप्ताहिक भारत में असहयोग आंदोलन के दौर में गांधी जी की प्रमुख आवाज़ बना।
नवजीवन, गुजराती साप्ताहिक, जिसका हिंदी संस्करण भी निकला।
हरिजन, साप्ताहिक, जो अस्पृश्यता-निवारण अभियान का मुख्य माध्यम था।
हरिजन बंधु: ‘हरिजन’ का गुजराती संस्करण।
हरिजन सेवक: ‘हरिजन’ का हिंदी संस्करण।
इनमें ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ शृंखला सबसे प्रभावी रहीं।
जेल जाने के दौरान कई बार इन अखबारों में संकट भी आए परंतुरिहाई के बाद गांधी ने अपने पुराने अख़बारों को दोबारा शुरू किया। ये अख़बार उनके लिए सत्याग्रह का हथियार थे उसे समय की परिस्थितियों संघर्षों और संदेश को लेकर के अक्सर गांधी जी द्वारा लेख लिखे जाते थे। इसीलिए जब अंग्रेज़ी शासन ने इन्हें दबाया, तो आज़ादी की लड़ाई में एक बड़ा मोर्चा ख़ाली हो गया।
भारत में गांधी जी द्वारा सबसे लोकप्रिय लिखा गया पत्र ‘हरिजन’ तीन भाषाओं में अंग्रेज़ी,गुजराती, हिंदी में प्रकाशित होकर जनप्रिय बना ‘हरिजन सेवक’ अंग्रेज़ी अख़बार का संपादन गांधी स्वयं करते थे। गुजराती और हिंदी संस्करण उनकी देखरेख में निकलते थे। इसके पीछे साफ़ सोच थी कि अस्पृश्यता जैसे सवाल पर संदेश हर भाषा-भाषी तक उसकी अपनी बोली में पहुँचे। यह अख़बार गांधी के ‘अछूतोद्धार’ कार्यक्रम को बताने का सबसे बड़ा माध्यम बना।
यह साप्ताहिक आठ पन्नों का था और प्रकाशक संस्था थी ‘सर्वेंट्स ऑफ़ अनटचेबल सोसाइटी’, यानी हरिजन सेवक संघ। पहले अंक में सबसे ऊपर रवि बाबू की एक कविता छपी और पहले पन्ने पर संघ के सचिव ठक्कर बापा की रिपोर्ट थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि कौन-कौन से मंदिरों के द्वार अछूतों के लिए खुले हैं, कहाँ कुएँ और तालाब सबके लिए उपलब्ध हैं और किस-किस जगह अछूतों के लिए स्कूल बने हैं। यह रिपोर्टिंग आगे के अंकों में भी चलती रही। यानी अख़बार केवल भाषण या उपदेश नहीं था, ज़मीनी प्रगति का लेखा-जोखा भी था।

‘हरिजन’ के प्रकाशन के अवसर पर डॉ. अंबेडकर का संदेश जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना और उसकी समाप्ति की इच्छा वाला एक छोटा बयान प्रमुखता से छापा और गांधी ने जवाब में जाति व्यवस्था पर अपनी राय बताने वाला लंबा लेख जवाब के रूप में दिया। गांधी का अपने सबसे बड़े वैचारिक आलोचक की बात को अपने ही अख़बार में सम्मान से जगह देना उनकी पत्रकारिता की उदारता का प्रमाण है। आज के दौर में, जब असहमति के लिए जगह घटती दिखती है, यह उदाहरण सीख देता है।
संपादकों की टोली
में महादेव देसाई कुछ समय संपादक रहे। हिंदी के प्रसिद्ध लेखक हरिभाऊ उपाध्याय उनके सहयोगी थे। बाद में किशोरलाल मशरूवाला को तीनों अख़बारों का संपादक बनाया गया और अंत में गुजरात विद्यापीठ को सँभालने वाले गणित और दर्शन के जानकार मगनभाई देसाई ने अख़बार की ज़िम्मेदारी सँभाली। इतने विद्वानों के बावजूद हर शब्द पर गांधी की छाप दिखती थी। यही कारण है कि अख़बार की शैली सरल थी, पर विचार गहरे।
रिकॉर्ड प्रसार, पर असल जीत विचार की
‘हरिजन’ गांधी के किसी भी अख़बार का सबसे सफल प्रकाशन साबित हुआ। कुछ ही समय में इसकी प्रसार संख्या दस हज़ार पहुँची और फिर तेरह हज़ार, जो गांधी के किसी भी अख़बार की सबसे बड़ी संख्या थी। सबसे दिलचस्प बात यह है कि दलितों के सवाल और सामाजिक मुद्दों को उठाने के बावजूद यह इतना लोकप्रिय हुआ। इसका अर्थ है कि समाज का एक बड़ा वर्ग उस दौर में भी इन सवालों पर संवाद के लिए तैयार था।
अख़बार ने मंदिर प्रवेश, वर्णाश्रम और छुआछूत की शास्त्रीयता जैसे विषयों पर गंभीर बहस छेड़ी। गांधी का तर्क था कि छुआछूत शास्त्रसम्मत नहीं है। इसके लिए उन्होंने स्वयं शास्त्रों का अध्ययन किया और संस्कृत विद्वानों से चर्चा की। इस बहस में रवींद्रनाथ टैगोर और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे बड़े नाम भी शामिल हुए। गांधी ने ‘हरिजन’ नाम और अंग्रेज़ी में छापने की मजबूरी पर भी अपनी सफ़ाई दी, जो उनकी पारदर्शिता दिखाती है।
राजनीति से दूर, समाज के क़रीब
आज़ादी की लड़ाई के बीच एक विशेष बात पर जोर देने के कारण इस अख़बार का राजनीतिक स्वर बहुत मद्धम रहा। यह गांधी की इस समझ को दिखाता है कि राजनीतिक आज़ादी तब तक अधूरी है जब तक समाज के भीतर की ग़ुलामी न टूटे।
यह भी सच है कि आज ‘हरिजन’ शब्द को कई लोग पसंद नहीं करते, और अस्सी के दशक के बाद उभरे नए दलित आंदोलन ने इस पर सवाल उठाए हैं। यह असहमति अपनी जगह जायज़ है और इतिहास को संतुलित नज़र से देखने की माँग करती है। फिर भी इस प्रयोग की नीयत और उसके सामाजिक असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
गांधी जयंती पर हमें सोचना चाहिए कि आज की पत्रकारिता गांधी की पत्रकारिता से क्या सीख सकती है। पहली सीख यह कि अख़बार का उद्देश्य जनहित हो, केवल प्रसार या विज्ञापन नहीं। दूसरी, कि असहमत आवाज़ों को भी सम्मान से जगह मिले। तीसरी, कि समाज के सबसे कमज़ोर तबके के सवाल पहले पन्ने पर आए और चौथी, कि पत्रकारिता केवल समस्या बताने तक न रुके, समाधान की दिशा में हो रही प्रगति की रिपोर्टिंग भी करे, जैसा ठक्कर बापा की रिपोर्टें करती थीं।
आज के समय में समाचार पत्रों में क्रांतिकारी की जायंटियों पर एड सपना बंद हो गए हैं क्योंकि सरकार इसके लिए पैसा नहीं देती अन्य विज्ञापनों के लिए पूरे पन्ने भरे रहते हैं क्या यह जरूरी नहीं है कि हम देश के लिए कुर्बान होने वाले क्रांतिकारियों को प्राथमिकता दें।
गांधी की सबसे बड़ी विरासत यही है कि उन्होंने “शब्द को कर्म से जोड़ा”ईमानदारी से सच को सच कहा। उनके अख़बार “केवल पढ़े नहीं गए, जिए गए”। यदि हम सचमुच बापू को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो केवल माल्यार्पण से आगे बढ़कर उनके बताए रास्ते पर चलना होगा।सच लिखना, निर्भीक लिखना, और समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए लिखना और सोशल मीडिया के जमाने में दिखाना होगा।
@रीना त्रिपाठी
महामंत्री
अखिल भारत नागरिक परिषद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *