भगत सिंह और मजदूर आंदोलन “इतिहास के सुनहरे पन्ने और वो बाते जिसे हम अक्सर भूल जाते है।

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23 मार्च की शाम जब भी आती है, दिल में एक अजीब सी हूक उठती है। सिर्फ तेईस साल की उम्र, और उस उम्र में इतनी गहराई, इतनी स्पष्टता जिसकी आज के समय में हम कल्पना नहीं कर सकते हैं सोचती हूं तो आज की पीढ़ी से तुलना किए बिना नहीं रह पाती ।भगत सिंह को हम आमतौर पर एक क्रांतिकारी के रूप में ही याद करते हैं, जिसने असेंबली में बम फेंका बिना किसी दोष के हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया। मगर सच यही है कि यह तस्वीर बहुत अधूरी है। भगत सिंह पहले एक विचारक थे, एक अध्येता थे, समाज सुधारक फिर कहीं जाकर क्रांतिकारी और क्रांति के इस सफर में एक विशेष पद्धति के अगुवा।

जेल की उस ठंडी, अंधेरी कोठरी में बैठकर भी वे किताबें मंगवाते रहे, पढ़ते रहे, लिखते रहे। फांसी से कुछ घंटे पहले भी वे लेनिन की किताब पढ़ रहे थे, यह बात मुझे हमेशा झकझोरती है। मौत सामने खड़ी थी, फिर भी ज्ञान की भूख जरा भी कम नहीं हुई। आज के दौर में जब हम एक किताब पूरी पढ़ने में महीनों लगा देते हैं, मोबाइल स्क्रीन की रील्स में घंटों गुजार देते हैं, तब भगत सिंह का यह पहलू हमें आईना दिखाता है कि असली ताकत कहां छिपी है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि भगत सिंह मजदूर आंदोलन से बेहद गहराई से जुड़े हुए थे। यह पहलू अक्सर उनके जीवन की चर्चा में दब जाता है, जबकि यही वह हिस्सा है जो उन्हें बाकी क्रांतिकारियों से अलग खड़ा करता है। उनका मानना था और यह बात आज भी उतनी ही सच है कि सिर्फ अंग्रेजों से सत्ता छीन लेना ही आजादी नहीं है। जब तक मजदूर और किसान का शोषण जारी रहेगा, तब तक स्वराज अधूरा ही रहेगा, चाहे झंडा किसी का भी लहराए।

     "नौजवान भारत सभा" के जरिए उन्होंने मजदूरों और किसानों को संगठित करने की कोशिश की, उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जगाने का काम किया। लाहौर और आस-पास के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों की सभाओं में जाकर उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि गोरे मालिक हों या काले, अगर शोषण की व्यवस्था वही रही तो मजदूर का जीवन नहीं बदलेगा।

असेंबली में बम फेंकने के पीछे भी उनकी मंशा किसी को मारना नहीं थी ,यह बात वे खुद बार-बार कहते थे कि “बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।” मकसद था उस दमनकारी सत्ता तक अपनी आवाज पहुंचाना, जो पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल जैसे कानूनों के जरिए मजदूरों की हड़ताल करने, संगठित होने और आवाज उठाने के अधिकार को ही कुचल देना चाहती थी। यह कोई आतंक फैलाने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित प्रतीकात्मक विरोध था और इसी वजह से उन्होंने बम फेंकने के बाद भागने की कोशिश तक नहीं की। वे चाहते थे कि अदालत का कठघरा उनके विचारों को जनता तक पहुंचाने का मंच बने।

भगत सिंह समाजवाद में गहरा विश्वास रखते थे। वे एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहां जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें न हों, जहां संपत्ति और संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा न हो। धार्मिक कट्टरता से उन्हें सख्त नफरत थी ।उनका मानना था कि धर्म के नाम पर बंटवारा देश की जड़ों को खोखला कर देता है और यही अंग्रेजों की “फूट डालो, राज करो” की नीति का सबसे बड़ा हथियार भी था। अपने मशहूर लेख “मैं नास्तिक क्यों हूं” में उन्होंने जिस तार्किकता, साहस और ईमानदारी के साथ अंधविश्वास और रूढ़िवादी सोच पर चोट की, वह आज भी हमें भीतर तक झकझोर देता है।

व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के समय में आज आवश्यकता है कि हमारी पीढ़ियां इतिहास के सुनहरे पन्नों को बिना किसी फेक सूचना के सत्यता के साथ जाने उसके लिए जरूरी हैभगत सिंह के उन साथियों द्वारा लिखी किताबों, लेखो, संस्मरणों को पढ़ना , उनके कुछ साथ चले साथियों ने भी अपने अनुभवों और विचारों को किताबों की शक्ल में हमारे लिए छोड़ा है, जो उस दौर को समझने के लिए अनमोल हैं। उनके साथी “यशपाल” जो खुद क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा थे और बाद में जाने-माने साहित्यकार बने, ने अपनी आत्मकथा “सिंहावलोकन” तीन भागों में लिखी, जिसमें उस दौर के संघर्ष, संगठन के भीतर के विचार-मंथन और साथियों के बलिदान का जीवंत ब्योरा मिलता है। “शिव वर्मा”जो भगत सिंह के बेहद करीबी साथी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के महत्वपूर्ण सदस्य थे, ने अपने संस्मरणों और लेखन के जरिए भगत सिंह के विचारों को सहेजने का काम किया, उन्हीं के प्रयासों से भगत सिंह के कई मूल दस्तावेज और लेख आज हम तक पहुंच पाए हैं। मन्मथनाथ गुप्त, जयदेव कपूर, भगवान दास माहौर, विभिन्न पत्रों में लिखे गए स्वयं भगत सिंह के लिखो का चमन लाल जी का संकलन, प्रदीप गर्ग द्वारा लिखित भगत सिंह की जीवनी इत्यादि ।इन साथियों की किताबें पढ़ना सिर्फ इतिहास जानना नहीं, बल्कि उस सोच को समझना है जिसने एक पूरी पीढ़ी को जगाया।

अब सवाल यह उठता है कि आज के युवाओं को भगत सिंह से आखिर सीखना क्या चाहिए? यह सवाल जितना सरल लगता है, जवाब उतना ही गहरा है।

सबसे पहली बात समय की कमी और रुचि की कमी से हमारी आने वाली पीढ़ियां किताबें और विचारों से दूर जा रही हैं सोशल मीडिया से ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं जिन्हें कुछ रुक कर सोचना और समझना चाहिए तथा भगत सिंह जी से सीख लेते हुए पढ़ने और सोचने की आदत डालनी होगी। हम घंटों मोबाइल स्क्रीन पर बिता देते हैं, रील के बाद रील देखते चले जाते हैं, मगर एक गंभीर किताब उठाने से कतराते हैं। भगत सिंह हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि “असली ताकत विचारों में होती है, नारों में नहीं”। जिस दौर में उन्होंने कार्ल मार्क्स, बाकुनिन, लेनिन जैसे विचारकों को पढ़ा, संसाधन नहीं के बराबर थे फिर भी उन्होंने पढ़ने का रास्ता नहीं छोड़ा। आज हमारे पास हर किताब एक क्लिक की दूरी पर है, फिर भी हम दूर भागते हैं।

दूसरी बात हमें तर्क और विवेक से सोचने की आदत सीखनी होगी। भीड़ जिधर बहे, उधर बह जाना सबसे आसान रास्ता है। सोशल मीडिया के इस दौर में बिना जांचे-परखे किसी भी बात पर यकीन कर लेना, किसी भी भावना में बह जाना बहुत सामान्य हो गया है। मगर सही-गलत परखने के लिए अपना दिमाग इस्तेमाल करना पड़ता है, सवाल पूछने पड़ते हैं , यही भगत सिंह ने अपने पूरे जीवन से सिखाया।

तीसरी बात, जो शायद सबसे जरूरी है , समाज में समानता के लिए खड़े होना। मजदूर, किसान, कर्मचारी ,दिहाड़ी पर काम करने वाला वर्ग, वंचित तबका , इनके दर्द को महसूस करना और इनके हक की बात करना ही असली देशभक्ति है, केवल झंडा लहराना या नारे लगाना नहीं। भगत सिंह के लिए देश का मतलब सिर्फ एक भौगोलिक सीमा नहीं था, बल्कि उस सीमा के भीतर रहने वाले हर इंसान की गरिमा और अधिकार थे।

और आखिरी बात अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का साहस हमें उसे 23 साल के युवा से सीखना चाहिए। भगत सिंह ने मौत को सामने देखकर भी समझौता नहीं किया, माफी नहीं मांगी, जबकि यह रास्ता उनके लिए खुला था। आज छोटी-छोटी परिस्थितियों में, जरा से दबाव में हम अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं यहीं भगत सिंह का जीवन हमें भीतर तक झकझोरता है और सवाल करता है कि हम किस मिट्टी के बने हैं।

शहीद ए आजम भगत सिंह को सच्ची श्रद्धा उनकी जयंती या शहीदी दिवस पर मोमबत्ती जलाने, माला चढ़ाने या भाषण देने से नहीं मिलेगी। सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारेंगे ,पढ़ेंगे, सोचेंगे, सवाल पूछेंगे, और समाज में फैली असमानता और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का साहस जुटाएंगे। यही वह विरासत है जो भगत सिंह अपने पीछे छोड़ गए, और यही वह जिम्मेदारी है जो आज की पीढ़ी के कंधों पर है — चाहे हम इसे स्वीकार करें या नहीं।
अखिल भारत नागरिक परिषद के महामंत्री के रूप मेंशहीदे आजम भगत सिंह की जन्म जयंती पर उन्हें श्रद्धा पूर्ण नमन।
@रीना त्रिपाठी
महामंत्री
अखिल भारत नागरिक परिषद

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