लखनऊ, 28 जुलाई 2026।
टीबी के नए मामलों की रोकथाम के लिए चलाए जा रहे टीबी प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट (टीपीटी) अभियान में जनपद ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। पल्मोनरी टीबी मरीजों के निकट संपर्क में आए 15,423 लोगों की पहचान की गई, जिनमें से 15,367 पात्र लोगों को टीपीटी प्रदान किया जा चुका है। इस प्रकार जनपद ने 99.5 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज की है। यह सफलता स्वास्थ्य विभाग की नियमित मॉनिटरिंग, घर-घर काउंसलिंग, स्वास्थ्यकर्मियों के सतत प्रयासों और समुदाय के सहयोग का परिणाम है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एन.बी. सिंह ने बताया कि टीबी उन्मूलन केवल मरीजों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि संक्रमण के जोखिम वाले लोगों को समय पर टीपीटी उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि टीपीटी टीबी की रोकथाम का एक प्रभावी उपाय है, जिससे संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने और भविष्य में नए मामलों को कम करने में मदद मिलती है। यदि पात्र व्यक्ति समय पर जांच कराकर टीपीटी का निर्धारित कोर्स पूरा करें, तो टीबी के नए मामलों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने बताया कि आशा कार्यकर्ता, टीबी हेल्थ विजिटर (टीबीएचवी) तथा अन्य स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर पात्र लाभार्थियों की पहचान, काउंसलिंग और नियमित फॉलो-अप कर रहे हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि यदि परिवार में किसी सदस्य को पल्मोनरी टीबी है, तो उसके निकट संपर्क में रहने वाले सभी लोग स्वास्थ्य विभाग में अपनी जांच अवश्य कराएं। यदि वे टीपीटी के पात्र पाए जाते हैं, तो बिना किसी डर या भ्रांति के उपचार का पूरा कोर्स अवश्य करें।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. ए.के. सिंघल ने बताया कि टीपीटी एक निवारक उपचार है, जो पल्मोनरी टीबी मरीज के निकट संपर्क में रहने वाले पात्र लोगों को दिया जाता है। उपचार शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित व्यक्ति को सक्रिय टीबी नहीं है। इसके बाद उन्हें निर्धारित अवधि तक दवा दी जाती है, जिससे भविष्य में टीबी होने की संभावना काफी कम हो जाती है। उन्होंने कहा कि टीपीटी संक्रमण की श्रृंखला को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और टीबी की बीमारी को समुदाय में फैलने से रोकने में काफी हद तक सहायता करती है।
उन्होंने बताया कि टीपीटी अभियान की सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों को उपचार के लिए प्रेरित करना है, जिनमें टीबी के कोई लक्षण नहीं होते और जो स्वयं को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग सबसे पहले पल्मोनरी टीबी मरीज के परिवार एवं निकट संपर्क में रहने वाले लोगों की जांच करता है। यदि उनमें सक्रिय टीबी नहीं पाई जाती, तो पात्रता के अनुसार उन्हें टीपीटी शुरू कराया जाता है। पाँच वर्ष या उससे अधिक की आयु के पात्र लाभार्थियों को तीन माह का टीपीटी कोर्स दिया जाता है, जिसमें सप्ताह में एक बार दवा की खुराक दी जाती है। यह उपचार भविष्य में टीबी विकसित होने के खतरे को काफी हद तक कम कर देता है।
डॉ. सिंघल ने बताया कि टीपीटी दवा के दुष्प्रभाव बहुत कम देखने को मिलते हैं। यदि किसी लाभार्थी को दवा लेने के दौरान कोई समस्या या प्रतिकूल प्रभाव महसूस हो, तो वह निकटतम टीबी यूनिट पर संपर्क कर आवश्यक परामर्श और उपचार प्राप्त कर सकता है। स्वास्थ्य विभाग यह सुनिश्चित करता है कि लाभार्थी बिना किसी भय के अपना निर्धारित कोर्स पूरा कर सकें।
उन्होंने कहा कि टीबी मरीज के निकट संपर्क में रहने वाले लोगों में संक्रमण का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है। ऐसे में टीपीटी उन्हें सक्रिय टीबी से बचाने का एक प्रभावी माध्यम है। स्वास्थ्य विभाग लाभार्थियों की नियमित निगरानी और समय-समय पर काउंसलिंग कर रहा है, ताकि प्रत्येक पात्र व्यक्ति उपचार का पूरा कोर्स समय पर पूरा कर सके। टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक पात्र लाभार्थी तक टीपीटी पहुंचाना और उपचार की पूर्णता सुनिश्चित करना स्वास्थ्य विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।
टीबी से बचाव में बड़ी उपलब्धि, 99.5 प्रतिशत लोगों को मिला टीपीटी
