तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा चलि

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चलिए आजादी भी मिल गई और हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भी बन गए।
पर क्या आज का नौजवान आज की युवा पीढ़ी उस आजादी के महत्व को समझ रही है जो खून का कतरा कतरा जोड़कर संघर्षों से मिली थी
यह भारत का लोकतंत्र ही है जिसने इतनी विविधता वाली आबादी को एक सूत्र में जोड़े रखा है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में हम चुनाव के पहले राजनीतिक सरगर्मियां तो देखते हैं और चुनाव जीतने के बाद लोगों द्वारा बनाए गए तंत्र में लोगों की यह घटना शुरू हो जाती है, जिसके हाथ में सत्ता होती है वह सहायक और मसीहा नहीं शोषणकारी और अपनी पार्टी के हितैषी नीति निर्माता बन जाते हैं। कानून चाहे जैसा भी बनाया जाए पर पूरी कोशिश करते हैं कि सड़कें खामोश रहे और संसद आवारा। तो जब सब कुछ लोगों की इच्छा शक्ति और वोट देने के अधिकार के तहत तय हुआ था तो फिर परिवर्तन कहां गया क्यों हमें अपने ही संसद और विधान भवनों में बनाए गए कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करना पड़ता है, क्यों संसद के अंदर विभिन्न पार्टियां अनुशासित नारे कर गाली गलौज और अमर्यादित भाषा पर उतर आते हैं??? क्या यही आजादी थी जिसे सुभाष चंद्र बोस ने कतरा कतरा खून की बूंदों के बलिदान से देश को दिया था।
शिक्षाविद, और वेस्टर्न फिलोसोफर फ्रेडरिच नित्से कहा करते थे”लोकतंत्र में कानून के द्वारा परिवर्तन नहीं लाया जा सकता लोकतंत्र में शिक्षा के द्वारा परिवर्तन लाया जा सकता है”तो लोकतंत्र के पहरी शिक्षा की कमी से बिगड़ गए। निश्चित रूप से शिक्षाविदों को अपना सर पकड़ लेना चाहिए।

     कमी जन सेवकों की नहीं निश्चित रूप से कहीं ना कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि बिहार में और उत्तर प्रदेश में आज तक शिक्षा का स्तर सुधर नहीं पा रहा। आज भी बेरोजगारी इतनी ज्यादा है कि लोग योग्य हो या ना हो ऐन केन प्रकारेन डिग्रियां इतनी रखते हैं जिसमें कोई स्किल ना हो। 
      ज्यादातर नीति निर्माता पढ़ाई की गुणवत्ता और स्तर को पूर्ण नहीं करते और ना ही संविधान में यह उल्लेख किया गया है कि राजनेता बनने के लिए शिक्षा की आवश्यकता है चुनाव लड़ने की उम्र तो निर्धारित है पर उसके लिए शिक्षा की आवश्यकता नहीं।
        यह चूक क्यों रखी है यह सोचने की बात है पूरे देश को चलाने वाली लोकतंत्र की धूरी राजनेता अनपढ़ क्यों रखे गए , क्यों कोई मापदंड निर्धारित नहीं किया गया।
   राजनीतिक पार्टियों की अपने विचार धाराएं होती हैं पर उस विचारधारा को बनाने के लिए विवेक शीलता और दूरदर्शिता की जरूरत होती है। अक्सर हम चुनाव में सुना करते हैं कि अपोजिट पार्टी दूसरी पार्टी या सत्ताधारी पार्टी पर आरोप लगाती है कि उन्होंने जनता के लिए कुछ नहीं किया छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए प्रदेश और देश के लोग तड़पते रहे।
 अभी हम हाल ही में उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनाव में भी ऐसी ही कुछ बातें देख रहे हैं किसी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे में मंदिर मस्जिद है तो कोई राजनीतिक दल बेटी हो तो लड़ सकती हूं जैसे नारे दे रहा है वही कोई कर्मचारी और किसानों को रिझाने का काम और बेरोजगारों को नौकरी देने की इच्छा रखता है वही दिल्ली के मुख्यमंत्री कहते हुए सुने जाते हैं कि आज भी देश के विभिन्न राज्यों से लोग देश की राजधानी दिल्ली में इलाज कराने क्यों आते हैं जबकि 5 साल के लिए अन्य राज्यों में सरकारें जिन भी पार्टियों की होती है वह अपने यहां चिकित्सा सुविधा व अन्य सुविधाओं में सुधार क्यों नहीं करते। आज की राजनीति किसी विशेष विचारधारा द्वारा निर्देशित नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में पहली बार दांव आजमा रहे आम आदमी पार्टी का कहना है कि उन्होंने व्यवस्था को बदलने के लिये राजनीति में प्रवेश किया है। अरविन्द केजरीवाल के शब्दों में - "हम आम आदमी हैं। अगर वामपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से विचार उधार ले लेंगे और अगर दक्षिणपंथी विचारधारा में हमारे समाधान मिल जायें तो हम वहाँ से भी विचार उधार लेने में खुश हैं। 
      निश्चित रूप से वोट की कीमत की अहमियत ना समझने वाली भोली-भाली जनता को समझना होगा अपने वोट की ताकत को समझ कर किसी भी लालच में ना पडते हुए विचार करना होगा कि उसे चाहिए क्या ??????
      यदि हम सामाजिक प्राणी हैं तो क्या हमें एक उन्नत समाज चाहिए , क्या हमें गरीबी बेरोजगारी नशे से  मुक्त समाज चाहिए? क्यों न हर घर ऐसा हो जहां रोजगार की सुविधाएं हैंक्यों हम स्वरोजगार के लिए सक्षम नहीं?? क्या हमारा समाज सामाजिक सुरक्षा चाहता है मां बहन और बेटियां रात हो या दिन अपने आप को सड़कों पर चलने के लिए सहज महसूस कर रही हैं। क्यों आज भी हम अपने यहां इंटर तक की शिक्षा मुफ्त नहीं कर पाए क्यों? आज भी हम गरीबी का रोना रोकर विश्व बैंक से अनुदान पाने वालों में सबसे आगे खड़े हैं। लोकतंत्र को सुधारना है और एक दिशा देनी है तो लोगों को इन सब बातों को सोचना ही होगा। ताकि फिर पांच वर्षों के लिए पछताना न पड़े।
  यूपी में हर पार्टी की सरकार आई लेकिन अपने घर भरने के सिवाय किसी ने प्रदेश के लिए कुछ भी नहीं किया। अर्थ के इस युग में अर्थव्यवस्था में सुधार हेतु कुछ विकास दिखाना ही पड़ता है, आज छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए यूपी के लोगों को दिल्ली क्यों जाना पड़ता है? क्या भारत का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है जो  भारत का सबसे बड़ा विकसित राज्य नहीं बन सकता?2022 के विधानसभा चुनाव में कई पार्टी उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ेगी। 2022में उत्तर प्रदेश के लोगों को स्वास्थ्य और शिक्षा समानता रोजगार कृषि उन्नति श्रेष्ठ व्यापार के तर्ज पर  लड़ा जा रहा है, यह तो अब सोचना ही पड़ेगा। 
        क्यों‘मोहल्ला क्लीनिक’, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, अच्छीऔर इंटर तक मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधा सभी राज्य में क्यों मुहैया नहीं कराई जा सकती है। निश्चित रूप से यह सब संभव है बस जरूरत है उंगली में नीला निशान लगाने वाले उस वोटर के जागरूकता की जो अपना कीमती वोट देकर संसद और विधानसभा से सड़क ,घर और मोहल्ले की नीतियां बनाने के पदाधिकारियों को चुनकर भेजता है।

      आज देश को सुभाष चंद्र बोस जैसे दूरदर्शी कूटनीतिज्ञ मार्गदर्शक राजनेता की आवश्यकता है जो देश की गरिमा और प्रतिष्ठा अपने मित्रवत व्यवहार के कारण पूरे विश्व में स्थापित कर सके ,बातें सिर्फ दिखावे की ना हो कुछ ऐसी हो जो इतिहास में मील का पत्थर बने।

       बात उत्तर प्रदेश की की जाए तो जनता को सत्ताधारी दल से सवाल पूछना चाहिए जमीनी स्तर का विकास कहां है??? जनता के टैक्स की  कमाई से दिया गया पैसा देश और प्रदेश के विकास में कितना लाभ पहुंचाने में सक्षम हो सकता??क्या कुछ ऐसा हुआ जिससे हम प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ सके क्या कुछ ऐसा हुआ कि बीए एमए और पीएचडी करने वाला छात्र हजार रुपए का बेरोजगारी भत्ता ना लेकर नौकरी पेशा बन सके और अर्थव्यवस्था में अपना अमूल्य योगदान दे सकें। अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष देने वाले कर्मचारी साठ साल के बाद खुद को अपाहिज ना महसूस करें और पेंशन से आच्छादित हो सके।
    आज प्रदेश और देश का विकास वहां की ‘गंदी राजनीति’खोखले दिखावेपन और ‘भ्रष्ट नेताओं’ की वजह से रुक गया है। जनता को जागरूक होना पड़ेगा और यह सोचना ही होगा की कहां है वह पार्टी जो ईमानदार सोच पैदा करेगी और यह साबित करे कि शासन सीमित संसाधनों का मोहताज नहीं है।
           अगर विशेष सुविधाओं की बात की जाए तो अगर दिल्ली के सरकारी अस्पताल देश के सबसे बेहतर हो सकते हैं तो यूपी के सरकारी अस्पतालों की हालत इतनी खराब क्यो हैं?’कैंसर जैसी अकाट्य बीमारियों के इलाज के लिए आज भी हमें सिर्फ मुंबई का रुख करना पड़ता है, अगर दिल्ली के लोगों को मुफ्त बिजली मिल सकती है तो यूपी के लोगों को मुफ्त में बिजली क्यों नहीं मिलनी चाहिए? अगर दिल्ली के सरकारी स्कूलों में निजी स्कूलों की तरह सुविधाएं मिल सकती हैं तो यूपी के सरकारी स्कूल इतने बदहाल क्यों हैं? इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी युक्त छात्रों को बैंगलोर का रुख क्यों करना पड़ता है।
  *आज यूपी सहित देश की की राजनीति में एक ही चीज कमी है, सही और साफ नीयत,राजनीतिज्ञों का देश को समर्पित नैतिक मूल्य*। वोटर को देखना होगा कि क्या कोई पार्टी है जो साफ नीयत से देश और प्रदेश को बदलने की नियत रखती हो।  ..... 

21 साल की उम्र में अपना पहला वोट देने वाले उस नादान वोटर को भी जागरूक होना होगा कि वह अपना भविष्य व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे मल्टीमीडिया के द्वारा परोसे गए ज्ञान से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर तलाश करें। इतिहास को जाने और लाइब्रेरी जोकि युवा पीढ़ी के लिए ज्ञान का भंडार थी एक बार फिर उन्हें जीवित करने का समय आ गया है।
कर्मचारियों को यह सोचना होगा कि जब सरके खामोश होती हैं तभी संसद आवारा होती है क्यों ना सड़कों पर उतर कर अपने हक और अधिकार की बातें सज्जनता पूर्वक करते रहे। क्यों पढ़ा लिखा युवक सड़कों पर जूता पालिश और चाट का ठेला लगाने को विवश है क्यों उसे अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है और कौन सी पार्टियां हैं जो सुरक्षा रोजगार आर्थिक सफलता और सामाजिक सहृदयता को बनाए रखने का मूल मंत्र पूरे देश को देने वाली है।
विचार करें यदि यह सब देने की छमता हमारे लोकतंत्र में नहीं बची तो वास्तव में आज चिंतन और मनन का समय है की बूंद बूंद खून देकर मिली आजादी को हम किस बाजार में नीलाम करने जा रहे हैं।
@रीना

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