लखनऊ : जीवन मे केवल दो ही वास्तविक धन हैं दोनों ही निश्चित और सीमित हैं,समय और सांसे

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ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनादि, अनुत्पन्न, नित्य, अमर आदि गुणों वाला है। वह सूक्ष्म जीवात्माओं को उनके जन्म-जन्मान्तरों के कर्मानुसार मनुष्य व अन्य योनियों में जन्म देकर उसके पूर्व कृत कर्मों का भोग कराता है। सिद्धान्त है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है। अतः हम मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों में जन्म लेकर उस योनि के शरीरों की अवधि पूरी होने पर मृत्यु को प्राप्त होते जाते हैं। शेष कर्मों का फल भोगने के लिए हमारा पुनः जन्म होता है।जीवात्मा जन्म लेता है और माता-पिता बनकर अपनी सन्तानों को जन्म देता है। यह तथ्य है परन्तु जीवात्मा को मनुष्य जन्म ईश्वर से मिलता है। उसी ने इस सृष्टि को रचा है।
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्। धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।।

इस श्लोक में कहा गया है कि भोजन करना, नींद लेना, भयभीत होना तथा संतान उत्पत्ति करना, ये चार बातें इंसान एवं पशु में एक जैसी होती हैं। इंसान में और पशुओं में सिर्फ धर्म का भेद है। यह एक मात्र ऐसी खास चीज है जो इंसान को पशु से अलग बनाती है। जिस इंसान में धर्म नहीं है वह पशु के समान है।
जानवर और मनुष्य में कई प्रवृत्तियां एक साथ एक समान होने के बाद भी क्या कभी किसी ने किसी जानवर को अपने जीवन को नष्ट करने के लिए आत्महत्या करते हुए देखा है??? निश्चित रूप से नहीं देखा होगा।
फिर यह सोचने का विषय है कि इस जगत की सर्वश्रेष्ठ कृति होने के बाद भी अक्सर हम अखबारों में आत्महत्या करते हुए लोगों को क्यों पढ़ते हैं ?क्या कारण है 21वीं सदी वाले हम रहते हुए भी तीन बच्चियां पैदा होने पर मां और उसकी निर्दोष बच्चियों को
जहर खाकर अपने जीवन को खत्म करना पड़ रहा है। अभी हाल ही में हम सब ने अखबार में पढ़ा एक 14 साल की बच्ची का सुसाइड नोट जिसमें उसने लिखा कि मां बेटी के लिए सिर्फ दो जगह ही सुरक्षित है एक मां के गर्भ और दूसरा मौत की गहरी नींद और यह लिख कर उसने आत्महत्या कर ली ऐसा क्या हुआ उसके साथ जो उसे यह कड़ा कदम उठाना पड़ा?
अक्सर आप और हम समाचारों में देखते हैं कि एक महिला परिवारिक कलह के कारण आत्महत्या कर ली एक पत्नी ने पति से अनबन के कारण आत्महत्या कर ली इत्यादि इत्यादि………… क्यों सरकारी योजनाये और कड़े कानून बेटियों, महिलाओ की सुरक्षा नही कर पा रहे है।
लड़कियों की उम्र 21 वर्ष करना मात्र समाधान नहीं, इसअभी तक समाज में पाए जाने वाले जानवर रूपी भेड़िए नोच नहीं खाएंगे इसकी क्या गारंटी है। कन्या भ्रूण हत्या शारीरिक मानसिक शोषण रेप हत्या और दहेज जैसी भीषण समस्याओं से बेटियों को बचा भी लिया जाए तो क्या गारंटी है कि आपकी बेटी घरेलू हिंसा का शिकार होते हुए मानसिक प्रताड़ना को सह पाएगी और अपना जीवन आगे निर्वाह कर पाएगी।
यक्ष प्रश्न यह उठता है क्यों हम समाज को इतना पारदर्शी नहीं बना पा रहे की समस्याओं को लेकर खुलकर बात करें एक दूसरे के ऊपर प्रत्यारोपण करने से अच्छा है कि अपनी अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वाह करें क्यों हम जन्म मनुष्य योनि में लेने के बाद भी जानवरों से कुछ सीख नहीं पा रहे क्यों हम उनकी तरह सशक्त और
मजबूत नहीं हो पा रहे और जीवन को क्षण मात्र के असमंजस से दुख और भटगांव में फस कर खत्म कर रहे हैं। आज समाज को इस बात की बहुत जरूरत है कि हम एक दूसरे को इंसान समझे हम एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें और एक दूसरे के दुख सुख में कंधे से कंधा मिलाकर सहारा देने की प्रवृत्ति को एक बार पुनः जागृत करें।

परोपकरणं येषां जागर्ति हृदये सताम। नश्यन्ति विपद्स्तेषां सम्पद: स्यु: पदे पदे।।

श्लोक में कहते हैं कि जिन सज्जन व्यक्तियों के दिल में दूसरों का उपकार करने की भावना जाग्रत रहती है उनकी विपत्तियां समाप्त हो जाती हैं तथा पग-पग पर उन्हें धन-संपत्ति की प्राप्ति होती है।यहाँ धर्म का अर्थ संकुचित नहीं अपितु व्यापक है । आमतौर पर धर्म को पूजा या उपासना पद्धति से जोड़कर देखा जाता है किन्तु धर्म इन सबसे भी व्यापक है। पूजा या उपासना पद्धति धर्म का एक उप समुच्चय है धर्म तो जीवन को सही तरीके से जीने का आधार प्रदान करता है। किसी भी धर्म में यह अनुमति नहीं दी गई है कि इस अमूल्य जीवन को क्षणिक आवेश में खत्म किया जाए।

सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य सामाजिक बंधनों में बाधा माता पिता के अनुरक्षण में पैदा हुआ बालक या बालिका परोपकार दया धर्म इत्यादि गुणों की सीख ले कर जीवन संग्राम में आगे बढ़ता है। समय-समय पर इतिहास के पन्नों में धर्म की विभिन्न परिभाषा को गढ़ा गया और सामाजिक संस्कार और सभ्यता संस्कृति को बनाए रखने के लिए समाज में प्रतिरूप भी किए गए।
महर्षि वेद व्यास जी ने परोपकार को ही सर्वोत्तम धर्म बताया ,महात्मा बुद्धा जी ने दया और क्षमा को धर्म बताया , स्वामी विवेकानंद जी ने दरिद्र नारायण कि सेवा को धर्म बताया, इसी प्रकार अनेकों महापुरुषों ने धर्म को अनेको तरह से समझाया किन्तु सबके विचार का मूल आधार परमार्थ कि सिद्धि ही था ।अर्थात मनुष्य होने कि पहली और अनिवार्यकि हमें केवल अपने लिए नहीं बल्कि औरों के लिए भी जीना होगा। सोई हुई संवेदना को जगाना होगा अपने परिवार अपने समाज अपने देश की बहन बेटियों और बालकों के आंसुओं को पोछने की प्रवृत्तिको बढ़ाने और उन्हे और उनकी भावनाओं को समझने का आसरा देना होगा।
माता-पिता का यह फर्ज है कि वह अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा दें, ताकि उन्हें समाज में मान-सम्मान मिल सके और वह दूसरों को मान सम्मान और आदर दे सकें।टेक्नोलॉजी के अत्याधुनिक युग में आज अश्लीलता का बाजार सभी के मोबाइलों में सर्व सुलभता से उपलब्ध है जो शायद समाज के कमजोर मानसिकता के व्यक्तियों के ऊपर हावी भी हो रहा है और आज रेप बलात्कार जैसी घटनाएं आम हो रही हैं। अतः माता-पिता को बच्चों का साथ और उचित ज्ञान समय समय पर देने का कर्तव्य भी निभाना होगा।
एक पिता का क्या फर्ज होता है तो देखें हर पिता अपने फर्ज को अच्छे से बखूबी निभाते हैं पिता अपने बच्चे का जीवन का पालन पोषण करते हैं उसके लिए हर सुविधाएं, हर संसाधन उपलब्ध कराते हैं और हमेशा उसकी समस्या में उसके साथ दीवार बनकर खड़े रहते हैं ताकि उसके बच्चे को कभी कोई दिक्कत ना हो कोई समस्या ना हो अपने स्तर से जो भी उनसे होता है वह हर कार्य के लिए हमेशा अपने बच्चों के लिए उपस्थित रहते हैं
एक सौम्य आलिंगन, थोड़ा सा प्रोत्साहन, प्रशंसा, अनुमोदन यहाँ तक की एक हल्की सी मुस्कान ही आपके बच्चों की खुशहाली व आत्मविश्वास की बढ़ोतरी के लिए बहुत सहायकारी साबित हो सकती है ।
चाहे आप उनसे कितना ही नाराज़ क्यों ना हों, उन्हें हर दिन यह बताएं कि आप उनसे कितना प्यार करते हैं ।
जीवन रूपी चक्र में सिर्फ हमारी संवेदनाएं हमारा धर्म और हमारे संस्कार ही एकमात्र हथियार है जो हमें जानवरों से अलग करते हैं। बच्चों का भी यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह समय से ज्ञान और कर्तव्य बोध कराने वाले माता-पिता का साथ दें उन पर विश्वास करें और उचित और अनुचित के भेद और आगाह की चेतावनी जो उनके माता-पिता द्वारा सिखाई गई है का पालन करें क्योंकि समय ना जाने कब बच्चों के सर से उनके माता-पिता को छीन लेगा और समाज किस ग्रंथ कुरीति से बच्चों का पालन पोषण करेगा यह नहीं कहा जा सकता।
सारांश अतः यह अकाट्य सत्य हम सबको जाना ही होगा कि जीवन में दो ही वास्तविक धन है समय और सांसे दोनों ही निश्चित और सीमित हैं चाहे आपकी हो आपके बच्चों की हो या आपके रिश्तेदारों की सभी प्रकार के क्लेश मनमुटाव, और अनादर की भावनाओं को निकालकर एक दूसरे का सम्मान करते हुए जीवन का सम्मान करना सीखना होगा तथा यह संदेश पूरे समाज तक देना होगा कि जीवन को खत्म करना इतना आसान नहीं है यह मिलकर जीवन को बचाने की मुहिम चलाएं। आप अपना कुछ समय देकर उस मनोवृति में फंसे हुए लोगों की मदद कर सकते हैं जो शायद आने वाले एक क्षण में यह निर्णय लेने वाले हैं कि जीवन को कैसे खत्म किया जाए।
आइए हम सब मिलकर मनुष्य होने का फर्ज निभाया एक दूसरे की भावनाओं को सम्मान देना सीखे।
@रीना त्रिपाठी

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